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सोचिए, पत्रकारिता के ABCD से Z तक, अ,आ से ज्ञ तक हम कहां हैं, मगर पत्रकार कहलाना चाहते हैं

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सोचिए, पत्रकारिता के ABCD से Z तक, अ,आ से ज्ञ तक हम कहां हैं, मगर पत्रकार कहलाना चाहते हैं दरभंगा, देशज टाइम्स। दरभंगा की पत्रकारिता पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। बदलते चरित्र, बदलता चेहरा, बदलती सोच, बदलती भावनाएं ये पत्रकारों को कहां और किधर ले जाएंगें यह सोचना आज के परिवेश में जरूरी है। मशहूर होना लेकिन कभी मगरूर मत होना। यह बात यहां के पत्रकारों ने कभी नहीं समझा।छू लो कदम कामयाबी के लेकिन अपनों से कभी दूर मत होना। यह बात लोगों ने नहीं समझा।

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ज़िंदगी में खूब मिल जाएगी दौलत और शौहरत मगर अपने ही आखिर अपने होते हैं यह बात कभी भूल ना जाना। मगर, खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की होड़ में कहते है ना, पत्रकारों में सबसे बड़ा होता है इगो। ये इंडिगो कि तरह यहां पत्रकारों को आसमानी ख्वाव दिखाने लगता है। हम, मैं, हमसे आगे कौन यह ठीक वैसे ही है जैसे बिना विश्वास का रिश्ता बिना नेटवर्क के मोबाइल जैसा, क्योंकि बिना नेटवर्क वाले मोबाइल के साथ लोग सिर्फ गेम ही  ही खेलते हैं।

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सोचिए, पत्रकारिता के ABCD से Z तक, अ,आ से ज्ञ तक हम कहां हैं, मगर पत्रकार कहलाना चाहते हैंयही गेम यहां के बंटते खेमों ने खेलना शुरू किया तभी से लगा, पानी से तस्वीर कहां बनती है मेरे दोस्त। ख्वाबों से तकदीर कहां बनती है मेरे भाई। जो सर्वश्रेष्ठ है वो रहेगा ही। तुम्हारे लाख चिल्लाने से व्यवस्था नहीं बदलेंगी। एक उदाहरण, डीएमसीएच पर लिख-लिखकर यहां के खास पत्रकारों ने अपनी कलम सूखा ली लेकिन क्या कभी बदला या बदलेगा अस्पताल का हालात…शायद सोचनीय। ऐसे में, आपस में मिलकर, एक दूसरे की इज्जत कर, जो आगे हैं उन्हें आगे समझकर, खुद को साबित करने के लिए आगे आने की जिद लेकर हम किसी भी रिश्ते को सच्चे दिल से निभाएंगें तभी सार्थकता, क्योंकि ये पत्रकारिता का दौर फिर वापस कहां मिलता है। सोचिए, पत्रकारिता के ABCD से Z तक, अ,आ से ज्ञ तक हम कहां हैं, मगर पत्रकार कहलाना चाहते हैंजो कर्म, जो कार्य आपने किए उसी का फल आपको ताउम्र मिलेगा तय है। मित्रों, यहां जो आज पत्रकारिता में आया है वह प्रशासन के कार्ड के लिए, प्रशासन में अपनी पहचान के लिए कि एसएसपी साहेब, डीएम साहेब हमें जानें, मेरे मोबाइल की एक रिंग पर उसे तत्काल उठाएं, थानों के एसपी हमें सलामी दें ये प्रवृत्ति हमें आगे नहीं बढ़ने देती। हम आगे नहीं बढ़ रहे। हम लिखना नहीं चाहते, हम पढ़ना नहीं चाहते। हम मनन नहीं करना चाहते मगर पत्रकार कहलाना चाहते हैं। यह सोचिए, पत्रकारिता के एबीसीडी से जेड तक, अ, आ से ज्ञ तक हम कहां हैं। क्या होगा अगर प्रशासन के रहनुमा एक कार्ड ना जारी करें मेरे नाम, क्या होगा अगर डीएम, एसएसपी हमें नहीं जानें, क्या कलम की ताकत को रोक लेंगे। ये लोकतंत्र है जनाब, हमारा लोकतंत्र जहां सच को स्वीकारना ही होगा। यही सत्य है। हमें आगे बढ़ना है।सोचिए, पत्रकारिता के ABCD से Z तक, अ,आ से ज्ञ तक हम कहां हैं, मगर पत्रकार कहलाना चाहते हैं

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