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फ़रवरी, 14, 2026
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दरभंगा की कोसी जरा सी क्या उफनाई, बह गई धार में 30 हजार आबादी के सपनों का पुल…कोसी की धार ने लोगों की लाइफ लाइन ही छीन ली, नदी की तेज धार में बहा चचरी पुल, बची सिर्फ नाव, यही तकदीर है कुशेश्वरस्थान पूर्वी की

जीवन आगे कैसे बढ़ेगा। जीवन की अगुवाई हम कैसे करेंगे। आना-जाना तो हर दिन है। फिर कैसे चलेंगे। कैसे बढ़ेंगे और कैसे लड़ेंगे इस विकट घड़ी से यह सवाल स्थानीय लोगों के जेहन में क्रोध बनकर सामने है। पढ़िए मनोरंजन ठाकुर के साथ,

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रभंगा, देशज टाइम्स ब्यूरो। दरभंगा में अभी बाढ़ नहीं आई है। लेकिन, लोगों की नसीब टूट गई। हमारी जरूरत के पंख कटकर पानी के बहाव में तैर गए। हमारा जीवन थम गया है। हम अपनी जिंदगी को लेकर फिर एक नई सोच में, नई लिखावटों के साथ खड़े हैं जहां लोगों के आवागमन का सहारा अभी से छिनने लगा है।

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ताजा मामला कुशेश्वरस्थान पूर्वी का है। जहां, कोसी की धार ने लोगों की लाइफ लाइन ही छीन ली है। भले, यह चचरी का पुल था। लेकिन, लोगों की जिंदगी इसी चचरी के सहारे टिकी थी, जो बह गई। मनोरंजन ठाकुर की रिपोर्ट

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रूख जिंदगी का यूं बाढ़ आने से पहले मोड़ ले लेगा। यह सोचा भी नहीं था कुशेश्वरस्थान पूर्वी के लोगों ने। जिंदगी यूं झटके में थम गईं। सांसों की माला में चचरी पुल के बहने की दहशत साफ पिरोई दिख रही है जहां, आसन्न बाढ़ की मंडराती साए के बीच जीवन संकटमय, संकटग्रस्त हो चला है।

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जीवन आगे कैसे बढ़ेगा। जीवन की अगुवाई हम कैसे करेंगे। आना-जाना तो हर दिन है। फिर कैसे चलेंगे। कैसे बढ़ेंगे और कैसे लड़ेंगे इस विकट घड़ी से यह सवाल स्थानीय लोगों के जेहन में क्रोध बनकर सामने है। जहां, उपाय शून्य है। तमाशा देखने वाले अनंत। मगर, इस जीवन से बाजीगरी करेगा कौन, किसके बूते इस संकट का हल, समाधान की लकीर खींची जाएगी, यह यक्ष प्रश्न है, शायद फिलहाल इसका जवाब प्रशासन के पास ही हो, मगर मुश्किल।

कारण भी साफ है, यहां के लोग आखिर कब तक खैराती, औरों से मांगकर, उधार जीवन में सपने बोएंगें, उसकी फसलें काटेंगे, उसी में जीते रहेंगे, उसी में डूबकर, इतराएंगें भी और मरेंगे भी?

आखिर कब तलक, हम सपनें देखें कि देश तरक्की कर रहा है। कब तक सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियों का हम खैर मनाएं, औरों के साथ तुलते रहेंगे, आखिर कबतलक?

और कब तक बैशाखियों के सहारे मीलों की दूरी तय करते रहेंगे, यह जानते हुए भी कि बैशाखियां सिर्फ सहारा दे सकती है, गति नहीं? हमारी गति उन ठहरे हुए पानी में है जहां नियति सुबह जागती भी है तो पानी में, नींद में ख्वाब भी आते हैं उसी पानी में। नसीबा मेरा पानी है, जीवन पानी-पानी है।

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अनिश्चितताओं और संभावनाओं की यह कशमकश हमारी जीवन की व्यथा से बचकर निकलपाने की जिद लिए हमारे अंदर एक ऐसा खौफ पैदा कर चुकी है, जिससे पार पाने की बस एक हथियार है हमारे पास एक अदद नाव। आइए, इसी नाव पर सवार होकर हम खबर की ओर लौटते हैं जहां अभी अभी हमारे सामने हमारी अपनी चचरी बहती, हमसे दूर चली गई है। पढ़िए पूरी खबर

जानकारी के अनुसार, नदी में आई अचानक से बाढ़ ने उजुआ कोला घाट पर बने तीन चचरी पुल को अपने साथ समेटे लेकर चली गई। पानी का बहाव इतना तेज था तीन पंचायतों की लगभग तीस हजार की आबादी की जिंदगी को झटके में अपने बहाव में फंसाए लेकर समेटते चली गई।

बड़ा संकट आन पड़ा है। इन बांस की चचरी पुल से यहां कुशेश्वरस्थान पूर्वी की तीन पंचायतें जुड़ी थी। यहां की लगभग तीस हजार लोगों की जिंदगी यूं झटके में बह गई। यातायात करीब करीब ठप सा हो गया।

प्रभावित लोगों की जिंदगी पटरी पर आने में समय लगेगा। कोसी की उपधारा का यह उजुआ घाट अब उजड़ गया है। यहां बने बांस की चचरी पुल की हकीकत अब ख्वाबों में पानी की तेज धारा में खोजने से भी शायद मिले।

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लोगों की जिंदगी उनकी आवाजाही पूरी तरह सड़कों से कटकर अब सिर्फ और सिर्फ नावों के भरोसे ही आन टिकी है। बाढ़ग्रस्त कुशेश्वरस्थान पूर्वी में बाढ़ की दस्तक बाढ़ प्रबंधन विभाग की तैयारी का जायजा ले रही है। नदी पूछ रही,अभी तक बाढ़ अनुश्रवण समिति की बैठक क्यों नहीं कर पाए हो। हम कहीं त्रासदी बनकर टूट पड़े तो ग्रामीणों की शामत आ जाएगी।

कोला उजुआ घाट पर चचरी की तीन पुल बनाई गई थी, जो कोसी की पानी के तेज बहाव में बह गया है। इसके साथ ही यहां की नसीब भी पानी में डूब गई। चिंता की हर लकीरें यहां की हर घर, हर लोग, हर कोण में दिखने लगा है, जो भयावह है।

जिन्होंने अपने हाथों से इस पुल के शिल्पकार बने, आज अथाह, थककर माथे पर सिकन और दिल में हूक लिए बैठे हैं। यहां के मनोज राय, मिथिलेश राय, महेश्वर मुखिया देशज टाइम्स को बताते हैं, हमारा सपना चूर हो गया। हमारी जिंदगी अथाह पानी में है। हम कहां जाएंगें, कैसे जाएंगें, कैसे हमारा जीविकोपार्जन चलेगा।

पुल का बहना हमारे सपनों का मर जाना है। आर्थिक कष्ट की घड़ी ऊपर से है। अब हमें घंटों अपने जीवन को थकाना होगा तब जाकर हम उस पार जा सकेंगे। घंटों की इंतजारी अब हमारी तकदीर बन गई है।

यह वही पुल है जिसने सुर्खियां बंटोरी थी अपने नाम को लेकर। ग्रामीणों ने विरोध में इसका नाम रखा था अंबानी पुल। लोगों ने कोसी नदी पर चचरी पुल बनाकर सरकार की उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल उठाया था जिसे लोग आज भी यही कहते हैं बह गया अंबानी सेतु पुल।

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मगर हकीकत यही है कोसी नदी के जलस्तर में बेतहाशा वृद्धि ने इस अंबानी सेतु पुल को बीती रात नदी की धार में समेट लिया।

वैसे, ग्रामीण साफ तौर पर कहते हैं, नदियों से पानी बाहर उतरा है। मगर सैलाब माथे पर है। समय भी शेष नहीं है। तैयारी कहीं मुकम्मल दिखती नहीं। कोसी नदी ठहर ठहर कर उबाल मार रही है। हिचकौले ले रही है।

ग्रामीण बताते हैं, मानसून सिर पर है। बस थोड़े दिनों में हम कुशेश्वरस्थानवासी बाझ़ के आगोश में होंगे। हमारे घर आंगन बाढ़ की लहरों में समावेश कर जाएगी। सिर्फ नाव ही हमारी नियति है सिर्फ नाव ही हमारी नसीब फिर से बन जाएगी।

कमला बलान के पानी में लगातार कमी देखी जा रही हैं। इन गांव के लोगों को सबसे ज्यादा इस बांस की चचरी वाले पुल ने झकझोरा है। कोला, उजुआ , उसड़ी, तेगच्छा , झाझा, कोदरा सिमरटोका, बुढिया सुकराशी औरथुआ, गोलमा तिलकेश्वर सहित तीस गांव ऐसे हैं जहां की प्रखंड और अंचल कार्यालय तक पहुंचना उतना आसान बचा नहीं।

कोशी नदी में तेज वृद्धि के कारण कुशेश्वरस्थान फुलतोड़ा सड़क के बीच उजुआ घाट पर पुल निर्माण के कार्य पर ब्रेक लग गया है |हालांकि कुशेश्वरस्थान फुलतोड़ा सड़क मार्ग में बन रहे इस पुल का लगभग सत्तर प्रतिशत काम पूरा कर लिया गया है |

सीओ अखिलेश कुमार बताते हैं, कोसी नदी में पानी बढ़ने की जानकारी मिली है। नाव मालिक और नाविकों को नाव पर क्षमता के अनुकूल ही सवारी बैठाने ही इजाजत दी गई है। सुबह छह बजे से शाम पांच बजे तक ही नदी घाटों में नाव का संचालन करने का निर्देश दिया गया है।

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