



दरभंगा, देशज टाइमस। सरकार बनाने बिगाड़ने की बात है करता, सिस्टम सुधारने की दम है रखता, दीवानगी की हदों को पार है करता, कलम कैमरे से प्रहार है करता, कभी दंगो में कभी बलवो में, खबर पाने की फ़िक्र में जनता को सच दिखलाने की जिद में अपनी फ़िक्र जो नहीं है करता धन से वंचित वह है रहता सरस्वती की पूजा है करता बुद्धिजीवी वह है कहलाता अभावग्रस्त जीवन वह जीता चौथे स्तम्भ की संज्ञा वो है पाता सर्वनाम होकर रह जो जाता पत्रकार वह है कहलाता।
आगरा के टीवी पत्रकार मानवेन्द्र मल्होत्रा ने जब यह कविता लिखी थी उस मनोदशा में पत्रकारों की परिभाषा ठीक वैसी ही थी जैसा शब्द कहता है। मगर, हालात बदतर हो गए हैं। पत्रकारों की हैसियत कम होती जा रही है। प्रेस के नाम पर गोरखधंधे हो रहे हैं। बालिका गृह कांड के साथ पत्रकारिता कहीं कोर्ट के कोने में सड़ रही हैं।
मगर हद यह तब भी हम चेत नहीं रहे। खुद की सुध लेने को भी तैयार नहीं। पत्रकारिता की सेहत से लगातार दुष्कर्म हो रहा है। उस पेशे के साथ खुद उसके लोग नामर्दी की हदें पार कर रहे हैं। सरस्वती के पुजारी धनकुबेर बनने की चाहत में गलत रूख अख्तियार कर उस रास्ते पर निकल पड़े हैं जिसका अंजाम बेहद शर्मनाक व खतरनाक मोड़ पर है। हालात यही है, सुना है कि अब मैं पत्रकार हो गया हूं
ना समझ था पहले अब समझदार हो गया हूं। बहुत गुस्सा था इस व्यवस्था के खिलाफ अब उसी का भागीदार हो गया हूं।








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