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Darbhanga जाले के कृषि वैज्ञानिकों की हलधरों को सलाह, धान की देर से पकाने वाली किस्में अब ना लगाएं, रखें नाइट्रोजन का ध्यान

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जाले,देशज टाइम्स। पिछले दो-तीन दिनों से हो रही बारिश धान की फसलों के लिए बेहद लाभदायक है। आसन्न हो रही बारिश धान की फसलों के लिए अमृत वर्षा के समान है। जिन किसानों ने समय रहते धान की बुवाई की उनके फसल लगभग 35 से 40 दिनों की हो चुकी है। इस समय पौधे को नाइट्रोजन की आवश्यकता ज्यादा होती है।

इस समय पौधे को ज्यादा एनर्जी की जरूरत होती है। इससे वह अपने कल्लों का फुटव अच्छे से कर सके। धान में कल्ले बनाने का समय 40 से 50 दिन तक रहता है। बहुत से ऐसे भी किसान हैं,जो बारिश का इंतजार कर रहे थे ताकि वे अपने खेतों में धान की रोपाई कर सकें।

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उन किसानों को सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि पौधे की प्रारंभिक वृद्धि के लिए फास्फोरस, पोटाश और सल्फर की जरूरत होती है। इस चरण में नाइट्रोजन की आवश्यकता कम होती है। इसलिए हमें पोटाश, सल्फर और फास्फोरस की पूरी मात्रा शुरू में ही दे देनी चाहिए।

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जड़ों का विकास भी इसी चरण में होता है। प्रारंभिक वृद्धि चरण धान की रोपाई करने से 14 दिन तक होता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि धान की देर से पकाने वाली किस्में

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अब ना लगाएं।

धान और पानी का बड़ा ही निर्मल नाता है। खेतिहर किसानों के लिए यह एक चर्चा का विषय होता है कि अब क्या करना चाहिए? लोगों में अक्सर यह कौतूहल होता है कि बारिश नहीं हुई है, तो क्या करें और अगर बारिश हो गई तो अब क्या करें?

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इन्हीं सारी विषयों के बारे में चर्चा के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र जाले के पौध संरक्षण वैज्ञानिक डॉ. गौतम कुणाल बताते हैं, बीते दो दिनों से रुक रुक कर हो रहे बारिश से किसानों के चेहरे खिल गए हैं।

जिले में खरीफ फसलों की बुवाई के शुरुआती चरण से ही बारिश का अभाव था। किसान बहुत कम क्षेत्रफल में धान की रोपनी कर सके है। सक्षम किसानों के अलावा किसी सरकारी परियोजना अंतर्गत जुड़े किसान ही धान की रोपाई कर सके हैं।

रोपनी किए खेतों के फसलों को बचाने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पर रही है। इस संकट की घड़ी में बिहार सरकार की ओर से संपोषित परियोजना जलवायु अनुकूल खेती कृषि विज्ञान केंद्र, जाले की ओर से 5 गांव में चल रहा है, जिसे देख किसानों को जलवायु अनुकूल खेती करने का संकल्प लिया है।

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जलवायु अनुकुकुल खेती परियोजना अंतर्गत 263 एकड़ क्षेत्रफल में धान की सीधी बुवाई की गई और इस विधि की ओर से बुवाई की गई धान की खेती में पानी बहुत कम लगती है। जिसकी वजह से इस विधि द्वारा बुवाई करने वाले किसानों को पानी के लिए ज्यादा परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी ।

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खरपतवारों के नियंत्रण के बारे में उन्हेंने कहा कि लंबे समय से सूखे के बाद हो रही बारिश की वजह से खरपतवा की वृद्धि में काफी तेजी देखने को मिलेगी। अत: इसके नियंत्रण के लिए बिसपाइरीबैक सोडियम नामक दवा का 80 से 100 मिली लीटर+पाइरोजोसल्फ्युरान

नामक खरपतवारनासी का 80 से 100 ग्राम प्रति डेढ़ सौ से 200 लीटर पानी की दर से 1 एकड़ में छिड़काव करने से खरपतवारओं की समस्या से निजात मिल सकता है। ध्यान देने योग्य बात है कि इन खरपतवार नाशक दवाओं के छिड़काव के 24 घंटे के अंदर खेतों में नमी होना आवश्यक है।

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