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जाले, देशज टाइम्स। जिला में चार दिनों से रुक रुक कर हो रही बारिश नहीं यह अमृत की वर्षा है। जो किसान पूर्व में वैकल्पिक व्यवस्था कर प्रमुख खरीफ फसल धान लगा दिए हैं, वैसे किसानों को कृषि वैज्ञानिक डॉ. गौतम कुणाल ने सुझाव दिया है कि,धान की खेती में दो प्रमुख सीमित कारक, प्रतिकूल मौसम और कीट व्याधि हैं।

धान के पौधे पर हमला करने वाले कीटों में से रोपाई के 30 से 60 दिनों के बीच पट्टी लपेटक किट काफी नुकसान पहुंचता है।
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तेज गर्मी के बाद, वातावरण में लंबे समय तक बादल छाए हुए हों तथा धुप की रोशनी कम है तो इस कीट का प्रकोप अधिक होता है। यह कीट मुलायम पत्तियों के दोनों किनारों को मोड़ देती है।
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इन्हीं पत्तियों के अंदर, यह कीट सतह के ऊतकों को खुरचते हैं। इससे सफेद धारियां बनती जाती है। और, सिरे सूख जाते हैं। इस कीट के नियंत्रण के लिए खरपतवारों को हटा दें, क्योंकि वे वैकल्पिक भोजन का स्रोत होते हैं।
निम्नलिखित कीटनाशकों में से किसी एक का छिड़काव करें: कार्टैप हाइड्रोक्लोराइड 50% एसपी 2 ग्राम-लीटर या प्रोफेनोफोस 50 ईसी 1.5 मिली-लीटर या क्लोरपाइरीफोस 20 प्रतिशत ईसी 2 मिली-लीटर या इंडोक्साकार्ब 15.8 ईसी 0.7 मिली-लीटर पानी में मिलाकर पत्तियों के ऊपर छिड़काव करें। जहां तक हो सके कार्बोफ्यूरान और फोरेट के अधिक प्रयोग से बचें, क्योंकि इनके परिणामस्वरूप कीट का पुनरुत्थान (रीसर्जेनस) होता है।
जिन किसानों ने अपने खेत में कोई भी फसल नहीं लगाई है, वे बागवानी फसलों की खेती करके अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि मानसून और आर्द्रता के बीच अगस्त का महीना किसानों के लिये खास अहमियत रखता है। इस दौरान मिट्टी में काफी नमी होती है, इससे खेती का खर्च तो बचता ही है। साथ ही इस मौसम में पौधों का विकास भी तेजी से होता है।
उन्होंने कहा कि खरीफ फसलों की पछेती खेती और सर्दी फसलों की तैयाारियां के लिये अगस्त का महीना बेहद अहम होता है। सब्जियों में मूली, टमाटर, बैंगन, आगत गोबी, लौकी, भिंडी भी एक बेहतर विकल्प हो सकता है।
इन फसलों का चयन कर किसान अन्य फसलों की तुलना में तीन गुना ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं। उद्यानिकी फसलों के लिए भी अगस्त का महीना बेहद अहम होता है। उद्यानिकी फसलों जैसे आम, लीची इन फसलों में फलों की तुड़ाई समाप्त हो चुकी है।
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अब इन फसलों की कटाई छटाई करना, आगामी वर्ष के लिए बेहद लाभदायक होगा कटाई छटाई के दौरान टहनियां की कटाई छटाई करें। कटाई के तुरंत बाद कटे भाग पर फूफंदनाश्क दवा (कॉपर आक्सीक्लोराइड) को करंज या अरंडी के तेल में मिलाकर पेस्ट कर देते हैं।
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कटे भाग पर गाय के ताजे गोबर में चिकनी मिट्टी मिलाकर लेप करना भी प्रभावकारी पाया गया है। इससे कटे भाग को किसी फफून्दियूक्त बीमारी के संक्रमण से बचाया जा सकता है।
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