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अंतिम संस्कार…Manoranjan Thakur के साथ

अंतिम संस्कार....उस व्यवस्था का, जहां निर्लज्ज व्यवस्था है। लड़खड़ाती, डंवाडोल, कौओं की फौज है। आम लोगों की जरूरत उनकी मजबूरी है। ऐसे में…समस्त समाज, इस देश का, किसका अंतिम संस्कार होना चाहिए यही आज यक्ष प्रश्न…। नारी शक्ति वंदन की पहली फेहरिस्त में, हम लिखेंगे, कहेंगे, बोलेंगे, महिलाओं की नर्म के पर्त्त खोलेंगे, जगाएंगें, सिस्टम को, नवाजेंगे उन महिलाओं के आगे शीश जो आज भी झेलती, कुंठित व्यवस्था की कठोर चाबुक से हर रोज लहूलुहान तो हो रही है। मगर, बोलती नहीं। उसी में लथपथ, उसी में सनी देह को आग पर सेंक रही हैं। चूल्हें भी फुंकती हैं, आग की गर्मी भी सह रही...। मगर, आज जब नारी शक्ति का वंदन हो रहा है, हमें जागना होगा। यहां हम ना पक्ष हैं, विपक्ष, हम उन महिलाओं के अत्याचार के आगे खड़े भर हैं, जो घर की चौखट से बाहरी दहलीज तक आज कहां, जहां सत्ता, राजनीति, नैतिकता, सुचिता, गरीबों, पिछड़ों, वंचितों के बीच जातिवाद, हकवाद, वंशवाद, नवनिरंकुशतावाद यह सब अब इस देश के लिए, उसकी सेहत, चरित्र, सोच, व्यवस्था, संबंध, संगठन, हिस्सेदारी उसके हक के लिए कोई नई बात नहीं है। पढ़िए नारी शक्ति वंदन की पहली कड़ी, अंतिम संस्कार...से, आगे करेंगे उसी देवी की बात जो केवल श्रद्धा है...

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पूरा देश आज भी सोया है। सरकारें आज भी निश्चिंत हैं। सिस्टम शून्य भाव में है। आम औरतों की धड़कनें यूं ही धड़कती, मूंदती, थकती, सो जा रही हैं।

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सिस्टम ने महिलाओं के न्याय के लिए दो शर्तें, महिला के साथ दरिंदगी के साथ गैंगरेप, दूसरी शर्त, महिला की मौत…दोनों की भाव में नकारा बनी सामने है। मगर, नारी शक्ति वंदन की शुरूआत उसी अंतिम संस्कार से, जिसने, समाज को झकझोरा, जगाया, मगर सिर्फ सोने के लिए…क्योंकि नई संसद का शोर है, नारी शक्ति की वंदन का नवविहान है…बिल्कुल अलसायी, डरावनी वाली…

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नौ-दस साल पहले निर्भया के साथ जब पूरा देश रोया, लगा, हमारा देश जाग गया है। सिस्टम में हवा भरी जा रही हैं। निश्चेत सरकारें होश में आने लगी हैं। मगर, फिर उसी लौ में अंतिम संस्कार सामने दिखा। अंतिम संस्कार उस व्यवस्था का, जहां निर्लज्ज पुलिस व्यवस्था है। सरकारी सोच है।

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आम लोगों की जरूरत उनकी मजबूरी है। ऐसे में…समस्त समाज, इस देश का, किसका
अंतिम संस्कार होना चाहिए यही आज यक्ष प्रश्न…। मणिपुर, हैदराबाद, हाथरस, राजस्थान, बिहार कहां की महिला, कहां का न्याय, कौन न्यायाधीश, कौन याचक कौन पीठाधीश सबके सब अंधे…अंधा कानून, न्याय दिलाने की मुहिम के आगे पस्त।

हाथरस की 18 साल की इस लड़की के साथ गैंगरेप हुआ था या नहीं? इस पर बहस के बदले होना क्या चाहिए था? देश में किसी भी बेटी को न्याय पाने के लिए पहले मरना क्यों पड़ता है? इसपर विमर्श होता। इस हत्याकांड ने एक बार फिर महिलाओं के प्रति हमारे समाज की सोच को बेपर्दा कर दिया है।

हाथरस की 18 साल की एक बेटी जो इस अंतिम संस्कार की महज एक बानगी भर है, के साथ एक खेत में हिंसा की जाती है। उसे इतनी बेरहमी से मारा-पीटा जाता है,उसकी रीढ़ की हड्डी टूट जाती है, उसके जीभ काट लिए जाते हैं।

उसके अंतिम संस्कार वाले अधिकार के साथ भी अन्याय किया जाता है। खेत में हिंसा की शिकार लड़की के शव को एक खेत में ही जला दिया जाता है। इसके लिए रात के ढाई बजे का समय चुना जाता है। जिन खेत खलिहानों में इस लड़की का बचपन बीता। वहीं, उसकी चिता जल रही है। बिना अपनों के हाथों मुखाग्नि के। पिता-भाई की राह देखती खाली हाथ हाथरस की बेटी अंतिम संस्कार के लिए चिता पर लेट गई।

सोचिए, जिस देश में खेतों में बेटियों की चिता जलने लगे, उस देश का भविष्य क्या होगा? इस मौत के पीछे कई सच्चाई है, जिसे सस्पेंड के चश्मे से कतई नहीं देखा जा सकता है। पुलिस की घिनौनी सूरत, सिस्टम की लाचारी, सरकार की बेबसी के आगे अंतिम संस्कार के कई मायने हैं। उस 14 सितंबर को थाने की जमींन पर बने चबूतरे पर लेटी उस लड़की के दर्द की अंतिम परिणिति जहां, अघोषित दरिदें उसका वीडियो बना रहे थे। एक लड़की दर्द से तड़प रही थी। आसपास खड़े पुलिस वाले आराम से वीडियो बना रहे थे। अस्पताल
पहुंचाने की कोशिश गायब दिखी। पुलिस वालों ने परिजनो को इसे अस्पताल पहुंचाने तक से मना कर दिया। बाद में लड़की का भाई अपनी बहन को जिस बाइक से लेकर थाना लाया था उसे छोड़ एक ऑटो में बिठाकर अस्पताल ले गया।

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सवाल यही, इस सिस्टम में आधी रात को अंतिम संस्कार किसका होना चाहिए। अस्पताल
से एंबुलेंस से पहुंची लाश का, उस वीडियो में दिखने वाले शख्स का जिसके बारे में पीड़िता बता रही है, उसके साथ 14 तारीख को क्या हुआ था। जब किसी महिला या युवती के साथ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को भी हमारे नेता, समाज के कुछ सम्मानित नागरिक व मीडिया समूह धर्म और जाति में बांटकर देखता है।

यह सभ्य समाज के लिए शर्मसार होने के अलावे कुछ नहीं बाकी छोड़ता। लड़की किस जाति की है, यह बताने से अपराध का दायरा बड़ा या छोटा नहीं हो जाता है। निश्चित ही इस तरह की ओछी मानसिकता समाज में द्वेष बढ़ाने की सोची-समझी राजनीति या रणनीति के अलावा कुछ नहीं है। बलात्कार चाहे गांव की किसी लड़की के साथ हुआ, या  मुंबई में कोई फिल्म निर्देशक किसी अभिनेत्री के साथ किया हो, कानून दोनों के लिए एक जैसे हैं।

कई प्रदेशों में महिला अपराध से जुड़े मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। अमेरिका में पढ़ने
वाली सुदीक्षा की बुलंदशहर शहर में छेड़खानी से बचने के दौरान सड़क हादसे में मौत। गाजियाबाद में भांजी को छेड़खानी से बचाने के दौरान पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या को लोग भूल नहीं पाए हैं।

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पूर्वी यूपी के भदोही जिले में गत दिनों लापता हुई एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की का शव नदी के किनारे मिला। नाबालिग लड़की के परिजनों का कहना है, गांव के पास के ही ईंट भट्टा संचालक ने रेप किया, फिर तेजाब डाल कर उसकी हत्या कर दी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में
हर दो घंटे में बलात्कार का एक मामला दर्ज हो रहा है।

आंकड़ों पर गौर करें तो 2018 में बलात्कार के 4,322 मामले दर्ज किए गए थे। राज्य में महिलाओं के खिलाफ 59,445 अपराध दर्ज किए गए हैं, जिनमें रोजाना 62 मामले सामने आए हैं। यह 2017 में 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जब कुल 56,011 अपराध दर्ज
किए गए थे। फिलहाल एनसीआरबी ने 2018 के बाद कोई भी अपराध का आंकड़ा नहीं
जारी किया। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा तीन साल में जारी किए आंकड़ों में अपराध कम होना बताया गया है।

बहरहाल, बसपा-सपा और कांग्रेस सहित तमाम दलों के नेताओं ने हाथरस में बलात्कार की शिकार और उसके बाद मौत की मुंह में चली गई युवती के नाम पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया। मगर, यह सिर्फ यूपी, मणिपुर, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश की ही बात नहीं है।

संपूर्ण देश इस अंतिम संस्कार की आग में जलकर राख होने को तैयार है मगर, दु:खद यह, कोई भी सरकार, कोई भी दल इसको लेकर कतई चिंतित हो ऐसा देश को लगता नहीं दिख रहा। नारी शक्ति वंदन तो हम करेंगे, जरूर करेंगे, लेकिन महिलाओं की हकीकत, उनके फंसाने, उनकी जरूरत, उनका अनुभव भी हम आपसे लगातार सांझा करते रहेंगे…क्योंकि नई संसद का शोर है, नारी शक्ति वंदन नई भोर है, मगर हकीकत और उसका फलसफा, साफ, स्पष्ट कुछ और है…हम खोलेंगे परत-दर-पत… मनोरंंजन ठाकुर के साथ।

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