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फ़रवरी, 11, 2026
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National Politics| Emergency News| इमरजेंसी वाली…क्षमा…प्रचंड बहुमत…कर्मों-दुष्कर्मों के आधार

जो नरेंद्र मोदी कल लोकतंत्र में सहमति का प्रवचन दे रहे थे| आज उन्होंने खुद स्पीकर-डिप्टी स्पीकर के मुद्दे पर अकड़ और टकराव का रास्ता अपनाकर साबित कर दिया है, उनमें कोई बदलाव नहीं आया है| न आने की कोई उम्मीद करनी चाहिए| स्पीकर पद पर सरकार और विपक्ष में आम सहमति नहीं बनी| विपक्ष को डिप्टी स्पीकर पद देने से इनकार| पहली बार होगा लोकसभा स्पीकर का चुनाव| विपक्ष ने केरल के कांग्रेस सांसद के सुरेश को मैदान में उतारा| ओम बिड़ला ने भी नामांकन भरा| कल होगा मतदान | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसा ही अपना एकदम भरोसेमंद बंदा चाहिए लोकसभा स्पीकर की कुर्सी पर| कभी सिर उठा भी हो तो मुद्रा अर्धनतमस्तक आसन वाली हो। लेटा भी दिखे | बैठा भी लगे | जो इतना लचीला हो, उनके मन-मुताबिक आसन कर सके| लगता है, एक बार फिर ओम बिड़ला ही से सुनने को मिलेगा- माननीय सदस्य! चुनाव के बाद पहले संसद सत्र के पहले दिन संविधान की गूंज रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब लोकसभा में बतौर सांसद शपथ ले रहे थे, विपक्ष के खेमें में सबसे आगे बैठे राहुल गांधी ने संविधान की प्रति लहरा कर उन्हें दिखाई। राहुल गांधी के साथ बैठे थे समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और उन दोंनों के बीच बैठे थे फ़ैज़ाबाद के सांसद अवधेश प्रसाद। यह अपने आप में एक अद्भुत दृश्य था। इसके जरिए बिना कुछ कहे इस बार विपक्ष के दो बड़े नेताओं ने संसद में एक संदेश दे दिया। संसद भवन आने वाले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सांसदों के हाथों में संविधान की प्रतियां थीं। असम के धुबरी से कांग्रेस के सांसद रकीबुल हसन ने तो संविधान की प्रति लेकर शपथ भी ली। लाल रंग की संविधान की प्रति को राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान अपनी तमाम सभाओं में मंच से जनता को दिखाकर संविधान पर संकट का आख्यान गढ़ा। जिसे अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव समेत विपक्ष के सभी नेताओं ने जनता से संवाद में आगे बढाया। इस बार, विपक्ष की बढ़ी गिनती के पीछे संविधान को मुद्दा बनाने में मिली सफलता भी एक बडी वजह रही है। बीजेपी का 400 पार का ग़ुब्बारा भी संविधान पर केंद्रित चुनाव प्रचार के चलते फुस्स हो गया। मगर, यहां बात इमरजेंसी की....Amitaabh Srivastava Former Executive Editor At TV TODAY NETWORK की खास रिपोर्ट...

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National Politics| Emergency News| अमिताभ श्रीवास्तव(Amitaabh Srivastava) इमरजेंसी वाली…क्षमा…प्रचंड बहुमत…कर्मों-दुष्कर्मों के आधारनरेंद्र मोदी, उनकी पार्टी और उनकी समर्थक मंडली हर साल की तरह इस बार भी इमर्जेंसी की याद दिला दिलाकर कांग्रेस को घेरने में लगे हैं।पिछले कई साल से यही हो रहा है। हर बार 25 जून को बीजेपी के नेता देश को इंदिरा गांधी के आपातकाल की याद दिलाकर कहते हैं कि देश कभी कांग्रेस को (PM Modi’s taunt on Indira’s emergency) माफ नहीं करेगा।

National Politics|EmergencyNews| उनकी समर्थक मंडली, जिसमें मीडिया के तमाम लोग भी शामिल हैं

नरेंद्र मोदी और उनकी समर्थक मंडली, जिसमें मीडिया के तमाम लोग भी शामिल हैं, को कुछ बातें याद करनी चाहिए। देश ने इंदिरा गांधी को इमर्जेंसी के बाद माफ करके दोबारा प्रधानमंत्री बना दिया था। इंदिरा गांधी ने स्वयं चुनाव हारने के बाद इमर्जेंसी की भूल को स्वीकार किया था और जनता ने उनको फिर से देश के नेतृत्व के लिए चुना।

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National Politics|EmergencyNews| उसी जनता ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को चार सौ पार वाला

उसी जनता ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को चार सौ पार वाला वह रिकॉर्ड बहुमत दिया जिसका सपना नरेंद्र मोदी भी इस बार देख रहे थे लेकिन सरकार की नीतियों से बेहाल जनता और विपक्ष की मेहनत ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया। फिर उसी जनता ने राजीव गांधी को मिली संख्या को भी कम करके उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया था। कांग्रेस नरसिंह राव की सरकार के बाद सत्ता से बाहर ही रही । फिर जनता ने अटल बिहारी वाजपेयी को सत्ता से बाहर करके कांग्रेस को फिर लौटाया और कांग्रेस को हटाकर मोदी को नेतृत्व सौंप दिया।

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National Politics| EmergencyNews| यह सब बताने का मकसद सिर्फ यह

यह सब बताने का मकसद सिर्फ यह कि जनता वर्तमान और भविष्य के आधार पर चुनावी फैसले लेती है, अतीत के आधार पर नहीं। इमरजेंसी के मुद्दे से आज की पीढ़ी का भावनात्मक लगाव बहुत कम है, न के बराबर। आज की पीढ़ी की ज्यादातर जनता अपने रोजगार, पढ़ाई, स्वास्थ्य,खेती-किसानी, महंगाई, अपने मौलिक अधिकारों, अपनी अभिव्यक्ति की आजादी या अन्य मुद्दों के आधार पर फैसले लेगी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के कर्मों-दुष्कर्मों के आधार पर नहीं।

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National Politics| EmergencyNews| इंदिरा गांधी ने आपातकाल संविधान के प्रावधानों के तहत लगाया था

एक बात और। इंदिरा गांधी ने आपातकाल संविधान के प्रावधानों के तहत लगाया था, अपने प्रचंड बहुमत का सहारा लेकर। उससे सीख लेकर यह भी कहा जा सकता है कि किसी दल या गठबंधन को प्रचंड बहुमत मिलना अच्छा नहीं है। वैसे मोदी की पर्सनालिटी और राजनीति में तो डिक्टेटरशिप की ही प्रधानता है। नरेंद्र मोदी तो खुद मन में नेहरू और इंदिरा गांधी का मिलाजुला व्यक्तित्व बनना चाहते हैं। उनका विरोध दिखवटी है। उनके राज में तो अघोषित आपातकाल पिछले दस साल से लागू है। (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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