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Darbhanga में मिथिला पेंटिंग: कला, संस्कृति और सशक्तिकरण का संगम, बेनीपुर की छात्राएं और बिखरे चटक रंग

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सदियों पुरानी एक कला, जिसने कभी राजा जनक (King Janak) के दरबार की शोभा बढ़ाई थी, आज न केवल भारत की पहचान बन चुकी है, बल्कि हजारों परिवारों के लिए आजीविका का सशक्त माध्यम भी है। इसी गौरवशाली परंपरा को जीवंत रखते हुए, बेनीपुर में एक ऐसा आयोजन हुआ, जहाँ युवा प्रतिभाओं ने अपनी कूची से मिथिला की विरासत में नए रंग भरे। इस अनूठी पहल ने कला, संस्कृति और सशक्तिकरण के एक अद्भुत संगम को साकार किया, जिसने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

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कला प्रतियोगिता का उद्देश्य (Purpose of the Art Competition)

हाल ही में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (Principal District and Sessions Judge) सह अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकार शिव गोपाल मिश्र (Chairman, District Legal Services Authority Shiv Gopal Mishra) के विशिष्ट निर्देश पर, परियोजना बालिका उच्च विद्यालय (Project Girls’ High School) में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के तहत विधिक साक्षरता क्लब (Legal Literacy Club) की छात्राओं के लिए मिथिला पेंटिंग (Mithila Painting) चित्रकारी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य छात्राओं को न केवल इस प्राचीन कला से परिचित कराना था, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ते हुए रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए एक मंच भी प्रदान करना था।

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मिथिला पेंटिंग: एक गौरवशाली इतिहास (Mithila Painting: A Glorious History)

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पैनल अधिवक्ता विनोद कुमार मिश्र (Panel Advocate Vinod Kumar Mishra) ने मिथिला पेंटिंग के समृद्ध इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस अनूठी चित्रकला शैली की शुरुआत रामायण काल (Ramayana Period) में हुई थी, जब राजा जनक (King Janak) ने अपनी पुत्री सीता (Sita) के विवाह के शुभ अवसर पर अपने महल की दीवारों पर इस विशेष चित्रकारी को करवाया था। यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ी। बाद में, अंग्रेज विलियम जे. आर्थर (William G. Archer) ने इस अद्भुत कला को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया, जिसके बाद इसे वैश्विक पहचान मिली। आज यह कला विश्व प्रसिद्ध है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

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संस्कृति और आजीविका का मेल (Confluence of Culture and Livelihood)

विनोद कुमार मिश्र ने अपने संबोधन में आगे कहा कि वर्तमान समय में सरकार भी इस कला को लगातार प्रोत्साहित कर रही है। मिथिला पेंटिंग (Mithila Painting) अब केवल मिथिला क्षेत्र या बिहार की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। यह न केवल हमारी गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, बल्कि हजारों कलाकारों, विशेषकर महिलाओं के लिए जीविकोपार्जन (Livelihood) का एक महत्वपूर्ण जरिया भी बन गई है। यह कला ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

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उत्साहित प्रतिभागी और गणमान्य व्यक्ति (Enthusiastic Participants and Dignitaries)

प्रतियोगिता में शामिल छात्राओं ने अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी कूची और रंगों से कागज पर मनमोहक आकृतियां उकेरीं, जिन्होंने सभी उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य अजहर जमाल नकवी (Principal Azhar Jamal Naqvi), क्लब के प्रभारी शिक्षक डॉ. गुलाम रब्बानी खान (Club In-charge Teacher Dr. Ghulam Rabbani Khan), पीएलवी सीमा कुमारी (PLV Seema Kumari) सहित कई अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। प्रतियोगिता में नैना कुमारी, शिवानी कुमारी, वंदना और रागिनी (Naina Kumari, Shivani Kumari, Vandana, Ragini) जैसी छात्राओं ने विशेष रूप से सक्रिय भागीदारी निभाई, जिन्होंने अपनी कला से मिथिला की परंपरा को नई ऊंचाई दी।

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