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फ़रवरी, 11, 2026
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देवघर: संविधान दिवस पर बच्चों ने ली राष्ट्र निष्ठा की शपथ, ‘यशोदा मां’ की तरह शिक्षा दे रही प्रिंसिपल

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देवघर। देश की नींव जिस संविधान पर टिकी है, उसके सम्मान और रक्षा की प्रतिज्ञा आज मोहनपुर के एक आवासीय विद्यालय में बच्चों ने ली। लेकिन इस शपथ ग्रहण समारोह से कहीं अधिक खास थी स्कूल की प्राचार्य की वो अनोखी सोच, जिसने वंचितों तक शिक्षा का प्रकाश पहुंचाने का बीड़ा उठाया है।

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संविधान दिवस के पावन अवसर पर, मोहनपुर स्थित “अनिल कुमार शकुन्तला देवी आवासीय विद्यालय” में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर विद्यालय की प्राचार्य श्रीमती मधुमाला कुमारी ने विद्यार्थियों को संविधान के मूल्यों को समझने और उसकी गरिमा बनाए रखने का संकल्प दिलाया।

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इस महत्वपूर्ण अवसर पर “शिशुपालन एजुकेशनल एण्ड वेलफेयर सोसाइटी” के अध्यक्ष श्री इन्द्र नाथ झा, विद्यालय के शिक्षक ज्योतिष कुमार, विशाल कुमार, मुन्नी कुमारी और प्रीति कुमारी उपस्थित रहे। विद्यालय की कैप्टन अजय कुमार के साथ, छात्र ज्योति कुमारी और हसीना कुमारी ने हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में छात्रों को शपथ ग्रहण करवाई। यह आयोजन बच्चों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया था।

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पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा की नई किरण

श्रीमती मधुमाला कुमारी, मूल रूप से बिहार के मधेपुरा जिले के कुमारखंड प्रखंड के रामनगर गांव की बेटी हैं। वे बांका जिले के अमरपुर प्रखंड के सुरिहारी गांव के समाजसेवी स्वर्गीय अनिल कुमार झा की पुत्रवधू हैं। समाजसेवा का यह संस्कार उन्हें विरासत में मिला है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण उनके शैक्षिक कार्य में दिखता है।

वर्ष 2012 से ही, श्रीमती मधुमाला कुमारी संताल परगना के पिछड़े माने जाने वाले मोहनपुर प्रखंड, देवघर में शिक्षा का अलख जगा रही हैं। उनका मुख्य ध्यान हरिजन, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के उन बच्चों पर है, जो शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने इस क्षेत्र में शिक्षा की लौ जलाने का अथक प्रयास किया है, ताकि कोई भी बच्चा ज्ञान के प्रकाश से दूर न रहे।

“देवकी के बच्चे, यशोदा मां की तरह” – अनूठी सोच

श्रीमती मधुमाला कुमारी की शैक्षिक पहल सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरे मातृत्व भाव से प्रेरित है। उनके एक प्रेरक नारे से उनकी यह भावना स्पष्ट झलकती है: “हमारे पास बच्चे रहते हैं – देवकी के; और मैं रखती हूँ – माँ यशोदा की तरह।” यह वाक्य उनके समर्पण को दर्शाता है कि वे बच्चों को न सिर्फ पढ़ाती हैं, बल्कि उन्हें पूर्ण स्नेह और संरक्षण भी देती हैं, ठीक वैसे ही जैसे माँ यशोदा ने देवकी के पुत्र कृष्ण का पालन-पोषण किया था।

यह अनूठी पहल दर्शाती है कि कैसे व्यक्तिगत समर्पण और सही दृष्टिकोण से समाज के सबसे वंचित वर्गों तक शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित की जा सकती है। संविधान दिवस पर ली गई यह शपथ सिर्फ एक रस्म नहीं थी, बल्कि यह श्रीमती मधुमाला कुमारी और उनके विद्यालय के प्रयासों की एक मजबूत गवाही थी, जो भविष्य के भारत की नींव को मजबूत कर रही है।

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