दरभंगा, कोर्ट रिपोर्टर। बिहार में कानून का राज स्थापित करने की जिम्मेदारी जिनकी कंधों पर है, वही अगर कोर्ट के आदेशों की अनदेखी करें तो क्या होगा? दरभंगा में कुछ ऐसा ही मामला सामने आया है, जहाँ एक थानाध्यक्ष को न्यायिक आदेश की अवहेलना भारी पड़ी है। कोर्ट ने न केवल उन पर जुर्माना लगाया है, बल्कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का भी आदेश दिया है।
व्यवहार न्यायालय दरभंगा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी जुनैद आलम की कोर्ट ने मनीगाछी थानाध्यक्ष को न्यायिक आदेश का पालन नहीं करने के लिए कड़ा सबक सिखाया है। कोर्ट ने थानाध्यक्ष पर पांच हजार रुपये का अर्थदंड लगाने के साथ ही उन्हें न्यायालय में सदेह हाजिर होने के लिए नोटिस जारी करने का आदेश भी दिया है। यह कार्रवाई न्यायालय के निर्देशों की लगातार अवहेलना के बाद की गई है, जिससे कानून के समक्ष सभी की समान जवाबदेही स्पष्ट होती है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा प्रकरण मनीगाछी थानाक्षेत्र के चकराजे निवासी सुरेश कमती द्वारा दायर एक आपराधिक मुकदमे से जुड़ा है। सुरेश कमती ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) कोर्ट में सीआर नंबर 905/25 के तहत एक परिवाद पत्र दाखिल किया था। परिवादी ने अपने आवेदन में आरोप लगाया था कि उन्होंने मनीगाछी थाना में एक आवेदन दिया था, लेकिन थानाध्यक्ष ने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की और प्राथमिकी दर्ज नहीं की। पुलिस की इस कथित निष्क्रियता से निराश होकर सुरेश कमती ने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
परिवादी की शिकायत सुनने के बाद, कोर्ट ने मनीगाछी थानाध्यक्ष को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 175(3) के तहत मामला दर्ज कर अनुसंधान करने का स्पष्ट आदेश दिया था। यह आदेश कानूनी प्रक्रिया के तहत पुलिस को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाने के उद्देश्य से दिया गया था।
अदालत का कड़ा रुख
हालांकि, आरोप है कि न्यायालय के इस स्पष्ट आदेश के बावजूद मनीगाछी थानाध्यक्ष ने न तो प्राथमिकी दर्ज की और न ही न्यायालय में कोई प्रतिवेदन (रिपोर्ट) सौंपा। थानाध्यक्ष की ओर से न्यायालय के आदेश का कोई अनुपालन नहीं होने पर कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया। न्यायिक आदेश की इस blatant अवहेलना को देखते हुए, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी जुनैद आलम की कोर्ट ने थानाध्यक्ष को पांच हजार रुपये का अर्थदंड जमा करने का आदेश पारित किया। साथ ही, उन्हें अगली सुनवाई में न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए नोटिस भी जारी करने का निर्देश दिया है। यह कदम पुलिस अधिकारियों द्वारा न्यायिक प्रक्रियाओं के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है।








