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29 नवम्बर, 2025

राज्यसभा के एक फरमान से देश में मचा बवाल, ‘जय हिंद’ और ‘वंदे मातरम्’ पर क्यों छिड़ी बहस?

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पटना न्यूज़: संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा से निकले एक बुलेटिन ने सियासी गलियारों में आग लगा दी है. जिन नारों ने देश को आजादी दिलाई, आज उन्हीं पर बहस छिड़ गई है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि ‘जय हिंद’ और ‘वंदे मातरम्’ जैसे नारे विवाद के केंद्र में आ गए?

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क्या है पूरा मामला?

दरअसल, हाल ही में राज्यसभा सचिवालय द्वारा एक बुलेटिन जारी किया गया. इस बुलेटिन में सदस्यों को सदन की कार्यवाही के दौरान ‘जय हिंद’ और ‘वंदे मातरम्’ जैसे नारे नहीं लगाने की सलाह दी गई. यह सलाह संसदीय परंपराओं और नियमों का हवाला देते हुए दी गई, ताकि सदन की गरिमा बनी रहे. लेकिन जैसे ही यह खबर सामने आई, इस पर राजनीतिक घमासान शुरू हो गया और आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज़ हो गया.

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विपक्ष ने खोला मोर्चा, पप्पू यादव ने सरकार को घेरा

इस सलाह पर विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई है. कांग्रेस और टीएमसी समेत कई पार्टियों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया. बिहार के पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने इस मामले पर सरकार को घेरते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि जिन नारों ने देश की आजादी की नींव रखी, उन पर सदन में रोक लगाने की सलाह देना दुर्भाग्यपूर्ण है. पप्पू यादव ने इसे देश के स्वाभिमान से जोड़ते हुए कहा कि ऐसे नारों पर किसी भी तरह की पाबंदी स्वीकार नहीं की जा सकती. उन्होंने इस कदम को तुगलकी फरमान बताते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए.

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JDU की सधी हुई प्रतिक्रिया

वहीं, इस पूरे विवाद पर एनडीए के सहयोगी दल जेडीयू ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी है. जेडीयू प्रवक्ता ने कहा कि ‘जय हिंद’ और ‘वंदे मातरम्’ जैसे नारे राष्ट्रीय गौरव और अस्मिता के प्रतीक हैं. इन नारों का सम्मान हर किसी को करना चाहिए और इन्हें किसी भी तरह के राजनीतिक विवाद में नहीं घसीटा जाना चाहिए. जेडीयू ने अपील की कि राष्ट्रीय महत्व के प्रतीकों को दलगत राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए ताकि उनकी गरिमा और पवित्रता बनी रहे.

राष्ट्रीय नारों पर सियासत क्यों?

यह पहली बार नहीं है जब संसदीय कार्यवाही या राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर विवाद हुआ हो. संसद की अपनी नियम-प्रक्रियाएं होती हैं जिनका उद्देश्य सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाना होता है. हालांकि, विपक्ष का तर्क है कि राष्ट्रीय भावना से जुड़े नारों को नियमों में बांधना सही नहीं है. इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि संसदीय नियमों और सदस्यों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. फिलहाल, यह मामला शांत होता नहीं दिख रहा है और इस पर सियासत जारी रहने की पूरी उम्मीद है.

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