

मुजफ्फरपुर से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जहां अन्नदाता कहे जाने वाले किसान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. सरकारी उदासीनता और विभागीय लापरवाही ने ऐसा माहौल बना दिया है कि धान की फसल का ‘पलायन’ बिहार से होकर पंजाब और हरियाणा के बाजारों तक पहुंच रहा है. आखिर क्या है किसानों की इस बदहाली की असली वजह, जिसने उन्हें अपनी मेहनत का सही दाम पाने से महरूम कर दिया है?
मुजफ्फरपुर जिले के धान उत्पादक किसान इन दिनों अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं. उनकी खून-पसीने से उगाई गई धान की फसल खेत-खलिहानों में तैयार खड़ी है, लेकिन सरकारी समर्थन मूल्य पर खरीद अभी तक शुरू नहीं हो पाई है. इस विलंब के पीछे सरकारी तंत्र की सुस्ती और सहकारिता विभाग की घोर लापरवाही को मुख्य कारण बताया जा रहा है, जिसकी कीमत किसान अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचकर चुकाने को मजबूर हैं.
किसानों की दोहरी मार: कम दाम और सरकारी अनदेखी
धान की कटाई के बाद किसान अपनी उपज को जल्द से जल्द बेचना चाहते हैं, ताकि वे अगली फसल की तैयारी कर सकें और अपने दैनिक खर्चों को पूरा कर सकें. लेकिन जब सरकारी खरीद का कोई ठिकाना नहीं होता, तो उन्हें मजबूरी में निजी खरीदारों या बिचौलियों का रुख करना पड़ता है. ये बिचौलिए किसानों की इस मजबूरी का फायदा उठाते हुए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से काफी कम दाम पर धान खरीदने के लिए मजबूर करते हैं. इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.
सरकारी खरीद की व्यवस्था में देरी के कारण उत्पन्न हुई यह स्थिति किसानों को दोहरा नुकसान पहुंचा रही है. एक तरफ उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ वे अगले कृषि चक्र के लिए आवश्यक पूंजी जुटाने में भी असमर्थ हो रहे हैं. यह न केवल उनकी वर्तमान आय पर असर डाल रहा है, बल्कि भविष्य की कृषि गतिविधियों को भी प्रभावित कर रहा है.
बिचौलियों का खेल: बिहार से पंजाब-हरियाणा तक धान का सफर
इस पूरे खेल में सबसे अधिक मुनाफा बिचौलियों को हो रहा है. विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा से आए बिचौलिए मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में धान खरीद रहे हैं. वे किसानों से धान बेहद कम दामों पर खरीदते हैं और फिर उसे अपने राज्यों में ले जाकर लगभग दोगुने भाव पर बेचते हैं. इस तरह, बिहार के किसानों की मेहनत का फल दूसरे राज्यों के व्यापारी और बिचौलिए खा रहे हैं, जबकि बिहार के किसान अपनी उपज का उचित दाम पाने से वंचित रह जाते हैं.
यह ‘अनाज का पलायन’ केवल आर्थिक नुकसान ही नहीं, बल्कि बिहार की कृषि व्यवस्था पर भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. जब राज्य के किसान अपनी फसल को समर्थन मूल्य पर बेचने में असमर्थ होते हैं, तो इसका सीधा असर उनकी आर्थिक स्थिति और कृषि के प्रति उनके रुझान पर पड़ता है. यह स्थिति राज्य के लिए भी चिंताजनक है, क्योंकि इससे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.
सहकारिता विभाग पर सवाल: कब शुरू होगी खरीद?
किसानों का आरोप है कि सहकारिता विभाग की लचर कार्यप्रणाली और सरकारी तंत्र की ढिलाई ही इस संकट के लिए जिम्मेदार है. यदि समय रहते समर्थन मूल्य पर धान खरीद की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती, तो किसानों को बिचौलियों के हाथों अपनी उपज बेचने की नौबत नहीं आती. अब सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक मुजफ्फरपुर के धान किसानों को इस बदहाली का सामना करना पड़ेगा और कब सरकारी तंत्र अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उन्हें उनका वाजिब हक दिलाएगा?






