
नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार बुधवार, 3 दिसंबर को गिरावट के साथ बंद हुआ। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों प्रमुख सूचकांक लाल निशान पर रहे। इसी के साथ, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये ने भी ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की। रुपया 90 रुपये प्रति डॉलर के पार निकल गया, जो एक नया रिकॉर्ड है। इस अभूतपूर्व गिरावट का असर देश के विभिन्न आर्थिक सेक्टर्स पर पड़ने की आशंका है। कुछ सेक्टर्स को जहां इस स्थिति से लाभ मिल सकता है, वहीं कुछ को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
आइए, विस्तार से जानते हैं कि रुपये की इस कमजोरी का विभिन्न प्रमुख सेक्टर्स पर क्या असर पड़ने वाला है:
फार्मा सेक्टर पर सीमित असर, इनपुट कॉस्ट बढ़ने की आशंका
भारतीय फार्मास्युटिकल सेक्टर पर रुपये में हो रही इस गिरावट का असर काफी हद तक सीमित रहने की उम्मीद है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिकांश फार्मा कंपनियां अपने विदेशी मुद्रा जोखिमों (डॉलर एक्सपोजर) को हेजिंग (Hedging) के माध्यम से कवर कर लेती हैं। कंपनियां दवाओं की कीमतों को पहले से ही तय कर लेती हैं, जिससे मुद्रा में उतार-चढ़ाव का सौदों पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता। हालांकि, कच्चे माल के आयात पर निर्भरता के कारण इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे मुनाफे पर थोड़ा दबाव आ सकता है।
आईटी सेक्टर के लिए खुशखबरी, मार्जिन बढ़ने की उम्मीद
रुपये की इस गिरावट से सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेक्टर को सीधे तौर पर फायदा पहुंचने की संभावना है। भारतीय आईटी कंपनियों की आय का एक बड़ा हिस्सा डॉलर के रूप में आता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो डॉलर में होने वाली कमाई का रुपये में मूल्य बढ़ जाता है, जिससे कंपनियों के मुनाफे (मार्जिन) में वृद्धि होती है। बुधवार के कारोबारी सत्र में आईटी सेक्टर के शेयरों ने बाजार में मजबूती दिखाई और निफ्टी आईटी सूचकांक ने बाजार को संभालने में अहम भूमिका निभाई।
केमिकल सेक्टर को भी मिलेगा लाभ
रसायन (केमिकल) सेक्टर भी रुपये की कमजोरी से लाभान्वित हो सकता है। इस सेक्टर की कई कंपनियां अपनी आय डॉलर के माध्यम से अर्जित करती हैं। इसके अतिरिक्त, कई भारतीय केमिकल कंपनियां अमेरिकी बाजार से भी सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। रुपये के कमजोर होने से इन कंपनियों की डॉलर में होने वाली आय का रुपये में मूल्य बढ़ेगा, जिससे उनके राजस्व और मुनाफे में इजाफा होने की उम्मीद है।
तेल और गैस सेक्टर पर मिश्रित प्रभाव
रुपये की कीमत में गिरावट का तेल और गैस सेक्टर पर मिला-जुला असर देखने को मिल सकता है। जो कंपनियां तेल और गैस का आयात करती हैं, उनकी लागत काफी बढ़ जाएगी, जिससे उनके मुनाफे में कमी आ सकती है। इसके विपरीत, जो कंपनियां तेल और गैस का उत्पादन और निर्यात करती हैं, उन्हें इस स्थिति से फायदा होने की उम्मीद है। कच्चे तेल की कीमतों के आयात के कारण बढ़ी हुई लागत और निर्यात से प्राप्त होने वाले बढ़े हुए राजस्व के बीच संतुलन बनाना इन कंपनियों के लिए एक चुनौती होगी।
(नोट: उपरोक्त जानकारी केवल सूचना के उद्देश्य से प्रदान की गई है। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। किसी भी निवेश निर्णय से पहले कृपया वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें। यह प्रकाशन किसी भी निवेश की सलाह नहीं देता है।)









