
नई दिल्ली: मार्गशीर्ष पूर्णिमा का पवित्र दिन, 4 दिसंबर 2025 को, भगवान दत्तात्रेय के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाएगा। यह जयंती, जिसे दत्तात्रेय जयंती के नाम से जाना जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस पावन अवसर पर, भक्त भगवान दत्तात्रेय की पूजा-अर्चना कर आध्यात्मिक शक्ति, परम शांति और ज्ञान की प्राप्ति का आशीर्वाद मांगते हैं।
भगवान दत्तात्रेय का महत्व
भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश – त्रिदेव का संयुक्त अवतार माना जाता है। उनका स्वरूप त्रिदेवों की शक्तियों का संगम है, जो सृष्टि के संचालन, पालन और संहार की शक्तियों का प्रतीक है। मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करते हैं और उन्हें जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाओं से मुक्ति दिलाते हैं। उनकी पूजा से आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है और मन को असीम शांति मिलती है।
शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
इस वर्ष दत्तात्रेय जयंती 4 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी। हालांकि, विशिष्ट शुभ मुहूर्त के लिए पंचांग देखना उचित होगा। सामान्यतः, इस दिन भक्त सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीपक प्रज्वलित कर, उन्हें पुष्प, फल, मिष्ठान्न आदि अर्पित किए जाते हैं। दत्तात्रेय स्तोत्र, कवच और आरती का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। कथाओं के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न करने के लिए गाय के घी का दीपक जलाना और पवित्र मंत्रों का जाप करना महत्वपूर्ण है।
धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएं
दत्तात्रेय जयंती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार का अवसर भी प्रदान करती है। भगवान दत्तात्रेय ने स्वयं विभिन्न प्राणियों से ज्ञान प्राप्त कर, अपने उपदेशों के माध्यम से इसे सभी तक पहुंचाया। उनकी शिक्षाएं जीवन जीने की कला और परम सत्य की प्राप्ति का मार्ग दर्शाती हैं। इस दिन भक्त ध्यान, जप और सत्संग के माध्यम से अपनी चेतना को जागृत करने का प्रयास करते हैं।

