
नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था लगातार बुलंदियों को छू रही है। पिछले लगातार दो तिमाहियों में जीडीपी ग्रोथ ने उम्मीदों को पछाड़ दिया है। कॉर्पोरेट जगत भी शानदार कमाई कर रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, कारोबारी साल 2025-26 की दूसरी तिमाही में देश की जीडीपी वृद्धि दर 8.2% रही, जो पिछले साल की समान अवधि के 5.6% से काफी अधिक है। इस मजबूत प्रदर्शन को अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने भी सराहा है।
आर्थिक विकास और रुपये का गिरता ग्राफ: एक पहेली
सवाल यह है कि जब देश की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत है, तो फिर भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार क्यों गिर रहा है? बुधवार को रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गया और पहली बार एक डॉलर 90 रुपये के पार चला गया। यह स्थिति बेहद हैरान करने वाली है, क्योंकि जीडीपी देश की आंतरिक आर्थिक सेहत का पैमाना है, जबकि मुद्रा का मूल्य बाहरी दुनिया में देश की प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
विकास और मुद्रा के बीच जटिल रिश्ता
इन्फॉर्मिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मनोरंजन शर्मा के अनुसार, आर्थिक विकास और मुद्रा के बीच का सीधा संबंध हमेशा स्पष्ट नहीं होता। उन्होंने समझाया कि मजबूत अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से रुपये को सहारा देती है, लेकिन यह एकमात्र कारक नहीं है। वैश्विक पूंजी प्रवाह, विभिन्न देशों के ब्याज दरों में अंतर और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं रुपये पर दबाव डाल रही हैं, जिससे डॉलर जैसी ‘सुरक्षित निवेश’ (सेफ हेवन) मुद्राओं की मांग बढ़ रही है। डॉलर को यह दर्जा इसलिए प्राप्त है क्योंकि वैश्विक अस्थिरता के समय में यह अपनी कीमत बनाए रखने में सक्षम होता है।
शर्मा ने आगे बताया कि भारत की ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के आयात पर निर्भरता, व्यापारिक साझेदारों के साथ मुद्रास्फीति का अंतर और बढ़ता चालू खाता घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) भी रुपये पर दबाव बढ़ा रहे हैं। इसलिए, यह सोचना पुराना हो चुका है कि मजबूत जीडीपी का मतलब स्वतः ही मजबूत रुपया होगा। एक मजबूत अर्थव्यवस्था और एक मजबूत मुद्रा के बीच कोई सीधा या एक-समान संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी इंगित किया कि अमेरिका में ऊँची ब्याज दरों के कारण भी रुपये की विनिमय दर में गिरावट आई है, जबकि आयात बढ़ा है।
रुपये की कमजोरी का एक प्रमुख कारण डॉलर का मजबूत होना भी है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक समझौतों पर चल रही बातचीत और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों में लगातार हो रहे बदलाव के चलते निवेशक अपना पैसा वापस डॉलर में लगा रहे हैं। जब भी ऐसा होता है, दुनिया भर की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले रुपया कमजोर पड़ता है।
रुपये के भविष्य पर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
क्या भारतीय रुपये में गिरावट जारी रहेगी? इस सवाल पर आर्यभट्ट कॉलेज में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर आस्था आहूजा का कहना है कि जब तक वैश्विक अनिश्चितता बनी हुई है, तब तक कुछ भी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है। आखिर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) भी कब तक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके रुपये को सहारा देता रहेगा। रुपये में मजबूती के लिए व्यापार घाटे को कम करना और व्यापार समझौतों का जल्द समाधान महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी वजह से रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक बन गया है।






