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फ़रवरी, 17, 2026
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दरभंगा: बाबा साहेब की विरासत और ‘संविधान पर संकट’ का शोर, क्या दलितों-वंचितों के हक छीन रही सत्ता?

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दरभंगा न्यूज़: 6 दिसंबर का दिन… एक तरफ संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस, तो दूसरी ओर ‘संविधान पर संकट’ और ‘दलितों-वंचितों के अधिकारों के हनन’ का तीखा आरोप. दरभंगा में आयोजित एक संगोष्ठी ने इन मुद्दों पर गहन बहस छेड़ दी, जहाँ वक्ताओं ने मौजूदा सत्ता पर कई गंभीर सवाल उठाए. भाकपा-माले और जन संस्कृति मंच के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम में अंबेडकर के विचारों की वर्तमान प्रासंगिकता पर जोर दिया गया, साथ ही सत्ताधारी दलों पर संवैधानिक मूल्यों को कुचलने की कोशिश का आरोप लगाया गया.

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दरभंगा के पंडासराय स्थित पार्टी कार्यालय में आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ माले नेता आर.के. सहनी ने की, जबकि संचालन की जिम्मेदारी माले नेता पप्पू पासवान ने संभाली. कार्यक्रम का शुभारंभ बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया, जिसके बाद वक्ताओं ने अपने विचार प्रस्तुत किए.

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‘संविधान पर हमले’ का आरोप और बिहार चुनाव

भाकपा-माले के जिला सचिव बैद्यनाथ यादव ने अपने संबोधन में वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर गंभीर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि यदि बाबासाहेब आज जीवित होते, तो वे निश्चित रूप से दलितों, वंचितों, गरीबों और मजदूरों के आंदोलनों के बीच खड़े होते. यादव ने इस बात पर जोर दिया कि बाबासाहेब के दिए संविधान से ही हमें नागरिक अधिकार प्राप्त हुए हैं, लेकिन एनडीए की मौजूदा सरकार इन संवैधानिक अधिकारों को लगातार छीन रही है. उनके अनुसार, इसका सबसे बड़ा उदाहरण बिहार विधानसभा चुनाव है, जहाँ एस.आई.आर. के नाम पर लगभग 49 लाख लोगों का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया.

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बैद्यनाथ यादव ने आगे आरोप लगाया कि सरकार बनते ही भाजपा-जदयू ने गरीबों के घरों को उजाड़ना शुरू कर दिया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि बाबासाहेब को सच्चे अर्थों में याद करने का मतलब तमाम तरह के शोषण-दमन और समानता विरोधी विचारधारा के खिलाफ संघर्ष करना है, और माले इसी दिशा में अग्रसर है. वरिष्ठ माले नेता आर.के. सहनी ने भी वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में डॉ. अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि आम जनता को समानता विरोधी विचारधारा के खिलाफ सचेत करना होगा तथा भाजपा-आरएसएस की तमाम दुर्भीसंधियों के खिलाफ संघर्ष करना होगा.

सहनी ने आरोप लगाया कि समानता, आजादी और उपासना की स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक मूल्यों को सत्ता द्वारा कुचला जा रहा है. उनके मुताबिक, इसके खिलाफ लड़ते हुए संविधान की रक्षा करना ही बाबासाहेब के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है.

बाबरी मस्जिद विध्वंस और सांप्रदायिक राजनीति

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो. सुरेन्द्र सुमन ने अपने संबोधन में 6 दिसंबर के दिन को एक विशेष संदर्भ से जोड़ा. उन्होंने कहा कि बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस के दिन ही सांप्रदायिक शक्तियों ने बाबरी मस्जिद के ढांचे को गिराया था. प्रो. सुमन ने इसे निम्नजातीय हिंदुओं, विशेषकर दलितों-पिछड़ों को समानता के संघर्ष के गौरवपूर्ण इतिहास से काटकर सांप्रदायिकता की आग में झोंकने का एक ऐतिहासिक षडयंत्र करार दिया.

उन्होंने दृढ़ता से कहा कि अंबेडकर और उनका समानतावादी संघर्ष आज भी जनस्मृति में जीवित है, और इसे और आगे बढ़ाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है. नागरिक मंच के जिला सह संयोजक अशर्फी राम ने भी मौजूदा हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि दलितों, वंचितों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामूहिक घृणा का माहौल तैयार किया जा रहा है, जिसका नेतृत्व भाजपा-आरएसएस कर रहा है.

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राम ने यह भी जोड़ा कि इस बर्बरता, हिंसा और छल-छद्म को पहचानने और ध्वस्त करने के लिए अंबेडकर जी के विचार अत्यंत आवश्यक हैं.

संगोष्ठी में विभिन्न संगठनों की भागीदारी

इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी में विभिन्न संगठनों के दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन के सचिव मिथिलेश सिंह, रंजीत कुमार राम, जसम के राज्य उपाध्यक्ष डॉ. रामबाबू आर्य, भाकपा (माले) राज्य कमेटी सदस्य शनिचरी देवी, अभिषेक कुमार, प्रो. कल्याण भारती, देवेंद्र साह, खेग्रामस जिला सचिव सत्यनारायण पासवान “पप्पू पासवान” जैसे प्रमुख नामों के साथ देवेंद्र कुमार, नगर सचिव कामेश्वर पासवान, रामदेव मंडल, मयंक कुमार, हरि पासवान, विनोद सिंह एक्टू नेता उमेश प्रसाद साह, भोला पासवान, प्रो. कल्याण भारती, अवधेश सिंह, डॉ. संतोष कुमार यादव, मोहम्मद जमालुद्दीन, रानी शर्मा, बसंती देवी, विश्वनाथ पासवान, राम विलास मंडल सहित कई अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं ने शिरकत की. सभी ने बाबासाहेब के आदर्शों को जीवित रखने और उनके संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने का संकल्प दोहराया.

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