



मिथिलांचल, भारत का वह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र है जिसकी पहचान केवल विद्या की देवी सरस्वती और जनक की नगरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र तीव्र राजनीतिक चेतना और उपेक्षित विकास यात्रा का विमर्श भी प्रस्तुत करता है। दशकों से यह क्षेत्र बाढ़, औद्योगिक पिछड़ापन और पहचान की राजनीति के खींचतान का शिकार रहा है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में, मिथिलांचल की प्रमुख मांगें अब केवल विकास योजनाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये क्षेत्रीय अस्मिता (Regional Identity) और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व पर केंद्रित हैं।
विकास का विरोधाभास: उपेक्षा और पलायन
मिथिलांचल की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा यहां का विकास का विरोधाभास है। यहां की उर्वर भूमि, कुशल मानव संसाधन और अद्वितीय सांस्कृतिक पूंजी के बावजूद यह क्षेत्र देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है।
बुनियादी ढांचे का संकट
सड़क, रेल, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे का घोर अभाव है। हर वर्ष बाढ़ इस ढांचे को क्षतिग्रस्त कर देती है, जिससे सरकारी निवेश का प्रभाव शून्य हो जाता है।
औद्योगिक ठहराव
यहां औद्योगिक निवेश नगण्य है। चीनी मिलों, जूट उद्योग और पेपर मिलों के बंद होने से बड़े पैमाने पर रोज़गार का संकट पैदा हुआ है।
पलायन की मजबूरी
शिक्षा और नौकरी के अवसरों के अभाव के कारण यहां का युवा हर वर्ष महानगरों की ओर पलायन करता है। यह न केवल क्षेत्र की प्रतिभा को खत्म करता है, बल्कि सामाजिक संरचना को भी कमजोर बनाता है।
‘मिथिला राज्य’ की मांग: पहचान की राजनीतिक अभिव्यक्ति
पिछले कुछ समय से मिथिलांचल में अलग राज्य की मांग ने राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। यह मांग केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय अस्मिता की उपेक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी के खिलाफ एक सशक्त अभिव्यक्ति है।
क्षेत्रीय भाषा और संस्कृति
इस आंदोलन का मुख्य आधार मैथिली भाषा और मिथिला संस्कृति को उसका संवैधानिक और प्रशासनिक सम्मान दिलाना है।
राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका
विभिन्न दलों के नेता इस मांग का समर्थन करते हैं, लेकिन केंद्रीय स्तर पर स्पष्ट रुख की कमी क्षेत्रीय समस्याओं को प्राथमिकता नहीं दिए जाने का संकेत देती है। आवश्यकता है इसे विकेंद्रीकृत विकास मॉडल के रूप में समझने की, ताकि स्थानीय संसाधनों और आवश्यकताओं के अनुसार नीतियां बन सकें।
समाधान की राजनीतिक आवश्यकता
मिथिलांचल की समस्याओं का समाधान केवल भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक प्रतिबद्धता और समग्र विकास मॉडल से ही संभव है।
आपदा प्रबंधन को विकास से जोड़ना
मिथिला-कोसी क्षेत्र को सिर्फ बाढ़ प्रबंधन नहीं, बल्कि जल संसाधन एवं गाद प्रबंधन की दीर्घकालिक नीति के अंतर्गत देखना होगा, जिसमें नेपाल के साथ कूटनीतिक सहयोग महत्वपूर्ण होगा।
स्थानीय निवेश प्रोत्साहन
सरकार को मिथिलांचल के लिए विशेष औद्योगिक प्रोत्साहन पैकेज घोषित करना चाहिए, जिसमें खाद्य प्रसंस्करण (मखाना, आम) और कपड़ा/हथकरघा उद्योग को बढ़ावा दिया जाए।
साहित्य और भाषा का सम्मान
मैथिली भाषा को प्रशासन, शिक्षा और न्यायिक प्रणाली में उचित स्थान देना चाहिए, जिससे स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक चेतना को मजबूती मिले।
पारदर्शी शासन
क्षेत्रीय विकास के लिए आवंटित फंड का पारदर्शी उपयोग और स्थानीय निकायों को सशक्तीकरण भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का प्रभावी उपाय है।
निष्कर्ष
मिथिलांचल की राजनीति निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। राजनीतिक दलों को यहां के लोगों को केवल वोट बैंक के रूप में देखने की बजाय उनकी क्षेत्रीय आकांक्षाओं, संस्कृति, भाषा और कृषि क्षमता के अनुरूप विकास का अधिकार देना होगा। मिथिलांचल का पुनरुत्थान, न केवल मिथिला के लिए, बल्कि बिहार और पूरे पूर्वी भारत के समग्र विकास की कुंजी है।





