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फ़रवरी, 10, 2026
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वाणी में छिपा चमत्कार: क्या सच में दिन में एक बार जीभ पर आती हैं मां सरस्वती?

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क्या आपके मन में कभी यह प्रश्न उठा है कि आपके मुख से निकले शब्द सिर्फ हवा में विलीन नहीं होते, बल्कि उनमें एक अदृश्य शक्ति समाहित होती है? हिंदू धर्म में वाणी को लेकर एक ऐसी ही गहन मान्यता प्रचलित है, जिसके अनुसार दिन का एक विशेष प्रहर ऐसा होता है, जब ज्ञान और कला की देवी माँ सरस्वती स्वयं आपकी जिह्वा पर विराजमान होती हैं। कहा जाता है कि इस शुभ बेला में बोले गए प्रत्येक शब्द में इतनी सामर्थ्य होती है कि वे यथार्थ का रूप ले सकते हैं। आइए, इस रहस्यमयी आस्था के पीछे छिपे धार्मिक और मनोवैज्ञानिक रहस्यों को विस्तार से जानते हैं।

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हिंदू धर्म में वाणी की पवित्रता और सरस्वती का स्थान

सनातन धर्म में वाणी को सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एक दिव्य ऊर्जा और सृजन का उपकरण माना गया है। ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों तक, शब्द की महत्ता का गुणगान किया गया है, जहाँ इसे ‘ब्रह्म’ के समान बताया गया है। इसी पवित्रता के चलते, वाणी की अधिष्ठात्री देवी, माँ सरस्वती को अत्यंत पूजनीय स्थान प्राप्त है। वे ज्ञान, बुद्धि, कला, संगीत और सत्य वचन की देवी हैं। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति अपनी वाणी को संयमित और सकारात्मक रखता है, उसे माँ सरस्वती का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे उसके बोले गए वचन अधिक प्रभावशाली होते हैं।

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वह विशेष समय: कब होती है माँ सरस्वती की कृपा?

यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि आखिर वह कौन-सा क्षण होता है जब माँ सरस्वती स्वयं जिह्वा पर विराजती हैं। धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, दिन का एक निश्चित ‘शुभ मुहूर्त’ होता है, जिसे इस मान्यता से जोड़कर देखा जाता है। यह समय विशेष रूप से ‘ब्रह्म मुहूर्त’ से संबंधित है, जिसे शास्त्रों में अत्यंत पावन और जागृति का काल माना गया है।

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ब्रह्म मुहूर्त: वाणी में दिव्यता का संचार

  • ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से लगभग 90 मिनट पहले प्रारंभ होकर सूर्योदय तक का समय होता है। इसकी अवधि लगभग 48 मिनट की होती है।
  • यह वेदों में वर्णित एक ऐसा समय है जब प्रकृति शांत होती है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह अपने चरम पर होता है।
  • इस दौरान ध्यान, योग, अध्ययन और आत्मचिंतन के साथ-साथ किसी भी शुभ कार्य का आरंभ करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है।
  • माना जाता है कि ब्रह्म मुहूर्त में मन सबसे शांत और एकाग्रचित्त होता है, जिससे व्यक्ति के विचारों और शब्दों में गहरी शक्ति एवं संकल्प निहित होते हैं। यही कारण है कि इस समय बोले गए शब्द अधिक प्रभावी और सत्य होने की संभावना रखते हैं।
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शब्दों का प्रभाव और संयमित वाणी का महत्व

जब यह कहा जाता है कि माँ सरस्वती जिह्वा पर आती हैं, तो इसका गूढ़ अर्थ यह है कि उस विशेष समय में व्यक्ति की वाणी में एक अद्भुत दिव्यता और प्रभावोत्पादकता आ जाती है। इस दौरान मुख से निकले सकारात्मक शब्द, आशीर्वाद, शुभकामनाएँ या संकल्प शीघ्र ही फलीभूत होते देखे गए हैं। वहीं, इसके विपरीत, नकारात्मक, कटु या क्रोधपूर्ण वचन भी उतनी ही तेज़ी से नकारात्मक परिणाम दे सकते हैं। यही वजह है कि इस पवित्र काल में वाणी पर विशेष संयम और सकारात्मकता रखने का परामर्श दिया जाता है। यह मान्यता हमें हर पल अपनी वाणी के प्रति सचेत रहने की शिक्षा देती है, क्योंकि शब्द केवल ध्वनि नहीं, बल्कि शक्तिशाली ऊर्जा के वाहक होते हैं जो हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं।

धार्मिक आस्था के साथ वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष

यद्यपि यह एक गहरी धार्मिक आस्था है, इसका एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक पहलू भी मौजूद है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से शरीर और मन दोनों शांत और ऊर्जावान महसूस करते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, इस समय मस्तिष्क ‘अल्फा तरंगों’ (Alpha waves) की स्थिति में होता है, जो गहरी एकाग्रता, रचनात्मकता और सकारात्मक सुझावों को ग्रहण करने के लिए आदर्श मानी जाती है। ऐसे में, यदि व्यक्ति स्वयं से या दूसरों से आशावादी और प्रेरणादायक बातें करता है, तो उसके अवचेतन मन पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह न केवल आत्म-विश्वास को बढ़ाता है, बल्कि लक्ष्य प्राप्ति में भी सहायक होता है। यह एक अवसर होता है जब व्यक्ति स्वयं को और अपने परिवेश को सकारात्मकता की ऊर्जा से भर सकता है।

निष्कर्ष:

सार्वजनिक रूप से प्रचलित यह मान्यता कि माँ सरस्वती दिन में एक बार जिह्वा पर विराजती हैं, हमें वाणी की असीम शक्ति और उसके सदुपयोग के प्रति जागरूक करती है। यह केवल एक प्राचीन पौराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मकता, संयम और शुभ विचारों को अपनाने का एक गहरा और प्रेरणादायक संदेश है। चाहे इसे धार्मिक श्रद्धा का विषय मानें या मानव मनोविज्ञान का गहन विश्लेषण, यह हमें यह सिखाता है कि हमारे शब्द ही हमारे वर्तमान और भविष्य का निर्माण करते हैं, अतः हमें सदैव अपनी वाणी का प्रयोग सोच-समझकर करना चाहिए।

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