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फ़रवरी, 10, 2026
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इंटरनेट पर आप जो कुछ भी तलाशते हैं, विज्ञापन कैसे जान लेते हैं? वजह जानकर आप चौंक जाएंगे!

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डिजिटल दुनिया में एक अजीबोगरीब रहस्य: आपने गूगल पर बस एक बार किसी जूते की तस्वीर देखी होगी, और फिर वही जूते का विज्ञापन हर वेबसाइट पर आपका पीछा क्यों करने लगता है? यह कोई जादू नहीं, बल्कि एक बेहद जटिल और प्रभावी ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम का कमाल है, जो आपकी हर डिजिटल गतिविधि पर पैनी नज़र रखता है. इस खेल के पीछे की कहानी जानकर आप यकीनन हैरान रह जाएंगे!

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इंटरनेट पर आपकी हर क्लिक, हर सर्च और हर वेबसाइट विजिट को रिकॉर्ड किया जाता है. यह रिकॉर्डिंग सिर्फ आपको बेहतर अनुभव देने के लिए नहीं होती, बल्कि इसका एक बड़ा हिस्सा विज्ञापनों को आप तक पहुंचाने में इस्तेमाल होता है. जब आप ऑनलाइन कुछ खोजते हैं या किसी प्रोडक्ट को देखते हैं, तो उससे जुड़ी जानकारी तुरंत दर्ज हो जाती है, और फिर यही जानकारी विज्ञापनदाताओं को आप तक पहुँचने में मदद करती है.

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‘कुकीज़’ और ‘ट्रैकिंग पिक्सल’ का अदृश्य जाल

इस पूरी प्रक्रिया की नींव में ‘कुकीज़’ (Cookies) और ‘ट्रैकिंग पिक्सल’ (Tracking Pixels) जैसे तकनीकी उपकरण होते हैं. कुकीज़ छोटी टेक्स्ट फ़ाइलें होती हैं, जिन्हें वेबसाइटें आपके ब्राउज़र में स्टोर करती हैं. ये आपकी पहचान के लिए पासपोर्ट की तरह काम करती हैं, याद रखती हैं कि आपने क्या देखा, क्या लॉग इन किया और क्या खरीदारी करने की कोशिश की. जब आप किसी वेबसाइट पर जाते हैं, तो वह कुकी आपके कंप्यूटर पर छोड़ देती है.

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इसी तरह, ट्रैकिंग पिक्सल या वेब बीकन अदृश्य छवियां होती हैं, जो वेबसाइटों और ईमेल में एम्बेड की जाती हैं. ये पिक्सल यह ट्रैक करते हैं कि आपने कब और कितनी बार किसी पेज को देखा या किसी ईमेल को खोला. आपके आईपी एड्रेस, डिवाइस टाइप और लोकेशन जैसी जानकारी भी इन पिक्सल के ज़रिए जुटाई जाती है, जिससे आपकी डिजिटल पहचान और रुचियों का एक विस्तृत नक्शा तैयार होता चला जाता है.

कैसे बनता है आपकी ऑनलाइन गतिविधियों से ‘प्रोफ़ाइल’?

विज्ञापन कंपनियां और डेटा ब्रोकर इन सभी जानकारियों को इकट्ठा करके आपकी एक विस्तृत डिजिटल प्रोफ़ाइल तैयार करते हैं. इसमें आपकी आयु, लिंग, रुचियां, आय वर्ग, शिक्षा और यहां तक कि आपकी राजनीतिक पसंद तक शामिल हो सकती है. आपकी सर्च हिस्ट्री, देखी गई वेबसाइटें, सोशल मीडिया एक्टिविटी और यहां तक कि आपके स्मार्टफोन पर मौजूद ऐप्स भी इस प्रोफ़ाइल को बनाने में योगदान करते हैं.

यह प्रोफ़ाइल विज्ञापनदाताओं को यह समझने में मदद करती है कि आप किस तरह के उत्पादों या सेवाओं में रुचि रखते हैं. उदाहरण के लिए, यदि आपने यात्रा स्थलों के बारे में सर्च किया है, तो आपको छुट्टियों के पैकेजों या एयरलाइन डील्स के विज्ञापन दिखने लगेंगे. यदि आपने किसी विशेष ब्रांड के कपड़ों को देखा है, तो उसी ब्रांड के अन्य उत्पादों के विज्ञापन आपको बार-बार दिखाए जाएंगे. इसे ‘रीमार्केटिंग’ या ‘रीटारगेटिंग’ कहा जाता है.

जब दिखते हैं ‘अनजान’ विज्ञापन, क्या है वजह?

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आपको ऐसे विज्ञापन दिखने लगते हैं, जिनके बारे में आपने कभी सीधे तौर पर सर्च नहीं किया होता. इसके पीछे भी कई कारण होते हैं. एक कारण यह है कि विज्ञापनदाता ‘लुकअलाइक ऑडियंस’ (Lookalike Audiences) का इस्तेमाल करते हैं. इसका मतलब है कि वे उन लोगों को टारगेट करते हैं जिनकी रुचियां उनके मौजूदा ग्राहकों जैसी होती हैं.

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इसके अलावा, आपकी सामान्य ऑनलाइन आदतों या आपके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ऐप्स के डेटा के आधार पर भी अनुमान लगाए जाते हैं. मान लीजिए, यदि आप फिटनेस ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं या स्वास्थ्य संबंधी लेख पढ़ते हैं, तो आपको पोषण सप्लीमेंट्स या जिम मेंबरशिप के विज्ञापन दिख सकते हैं, भले ही आपने उन्हें सीधे सर्च न किया हो. विभिन्न डेटा प्रदाता कंपनियां भी आपकी जानकारी को आपस में साझा करती हैं, जिससे विज्ञापनदाताओं को आपकी रुचियों की गहरी समझ मिलती है.

निजता और आपका नियंत्रण: क्या हैं आपके विकल्प?

यह समझना ज़रूरी है कि यह ट्रैकिंग तकनीक विज्ञापनदाताओं के लिए बेहद फायदेमंद है, लेकिन यह हमारी निजता (Privacy) पर भी सवाल खड़े करती है. अच्छी बात यह है कि आपके पास अपनी ऑनलाइन निजता को नियंत्रित करने के कुछ विकल्प मौजूद हैं:

  • ब्राउज़र सेटिंग्स: आप अपने वेब ब्राउज़र की सेटिंग्स में जाकर कुकीज़ को ब्लॉक कर सकते हैं या उन्हें नियमित रूप से हटा सकते हैं.
  • विज्ञापन सेटिंग्स: गूगल, फेसबुक और अन्य बड़ी विज्ञापन कंपनियां अक्सर अपनी ‘विज्ञापन सेटिंग्स’ (Ad Settings) में बदलाव करने का विकल्प देती हैं, जहां आप अपनी रुचियों को संपादित कर सकते हैं या व्यक्तिगत विज्ञापनों को बंद कर सकते हैं.
  • इन्कॉग्निटो मोड (Incognito Mode): ब्राउज़र का इन्कॉग्निटो मोड या प्राइवेट ब्राउज़िंग आपकी सर्च हिस्ट्री और कुकीज़ को अस्थायी रूप से सेव होने से रोकता है, हालाँकि यह आपको पूरी तरह से अदृश्य नहीं बनाता.
  • VPN और प्राइवेसी टूल्स: वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) और कुछ खास ब्राउज़र एक्सटेंशन आपकी ऑनलाइन एक्टिविटी को और अधिक निजी बनाने में मदद कर सकते हैं.
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कुल मिलाकर, ऑनलाइन विज्ञापनों का आपकी हर हरकत पर नज़र रखना एक जटिल तंत्र का परिणाम है. जागरूकता ही इस डिजिटल दुनिया में अपनी निजता को सुरक्षित रखने का पहला कदम है. अगली बार जब कोई विज्ञापन आपके मन की बात कह दे, तो समझ जाइएगा कि यह सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित डिजिटल ट्रैकिंग का नतीजा है.

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