
Mera Naam Joker: सिनेमा के कैनवास पर कुछ कहानियां रंगों से नहीं, बल्कि किसी फनकार के जिगर के टुकड़े से बनती हैं। राज कपूर के लिए यह फिल्म महज़ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि उनकी आत्मा का अक्स थी, जो परदे पर उतरते ही एक दर्दनाक हकीकत बन गई। 18 दिसंबर 1970 का दिन हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक ऐसी ही तारीख के तौर पर दर्ज है, जब शोमैन राज कपूर की सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म परदे पर उतरी और धड़ाम हो गई।
फिल्म को लेकर दीवानगी का आलम यह था कि शुक्रवार को रिलीज होने वाली फिल्म के लिए सोमवार से ही एडवांस बुकिंग के काउंटर पर हज़ारों की भीड़ जमा थी। हर कोई पहले दिन का पहला शो देखने को बेताब था, लेकिन कुछ ही दिनों में यह उत्साह एक गहरे सन्नाटे में तब्दील हो गया।
Mera Naam Joker: क्यों एक शाहकार बन गई थी ‘शोमैन’ के लिए नासूर?
शुरुआत में फिल्म के फ्लॉप होने की कई वजहें गिनाई गईं। पहली वजह थी फिल्म की असाधारण लंबाई। दो इंटरवल के साथ यह फिल्म जोकर के बचपन से लेकर बुढ़ापे तक के तीन पड़ावों को दिखाती थी, जिसमें हास्य के साथ दर्शन और दर्द का गहरा पुट था, जिसे शायद उस दौर के दर्शक पचा नहीं पाए। उसी दौरान देव आनंद की ‘जॉनी मेरा नाम’ और दिलीप कुमार-सायरा बानो की ‘गोपी’ जैसी फिल्में भी रिलीज़ हुई थीं, जो बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर रही थीं। लोगों के बीच यह कानाफूसी होने लगी कि इतनी भव्य फिल्म बनाकर राज कपूर कहीं सड़क पर न आ जाएं।
खाली थियेटर और झूठी अफवाहें: बॉलीवुड की सबसे गहरी साज़िश
फिल्म की लंबाई और कहानी का भारीपन जैसी बातें तो महज बहाना थीं। असलियत कुछ और ही थी, जो बॉलीवुड की सबसे गहरी और सोची-समझी साजिशों में से एक थी। दरअसल, उस दौर में राज कपूर सफलता का दूसरा नाम बन चुके थे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उनका कद इतना बड़ा हो गया था कि कोई भी दूसरा निर्माता अपनी फिल्म उनकी फिल्म के आसपास रिलीज करने से डरता था। मेरा नाम जोकर को बनने में पूरे छह साल लगे और इसकी रिलीज डेट बार-बार बदलती रही, जिससे निर्माताओं की एक लॉबी परेशान हो गई थी।
इसी लॉबी ने राज कपूर को सबक सिखाने के लिए एक घिनौनी चाल चली। जब फिल्म रिलीज हुई, तो उन्होंने एक हफ्ते के सारे टिकट एडवांस में खरीद लिए। नतीजा यह हुआ कि जब आम दर्शक टिकट के लिए लाइन में लगते, तो उन्हें ‘हाउसफुल’ का बोर्ड मिलता, जबकि अंदर सिनेमा हॉल खाली पड़े रहते थे। साजिश करने वालों के कुछ लोग ही अंदर बैठकर फिल्म देखते और बाहर निकलकर लाइन में लगे लोगों से कहते, “फिल्म बकवास है, सिरदर्द है, पैसे बर्बाद मत करो।” यह सुनकर लोग अपने टिकट वापस बेचकर चले जाते। यह सिलसिला कई दिनों तक चला और एक अच्छी फिल्म नेगेटिविटी की भेंट चढ़ गई।
‘बॉबी’ का दांव और शोमैन की शानदार वापसी
इस फिल्म की नाकामी ने राज कपूर को आर्थिक और भावनात्मक रूप से तोड़कर रख दिया था। उनका स्टूडियो और गहने तक गिरवी रख गए थे। लंबे समय तक वह समझ ही नहीं पाए कि उनकी मेहनत के साथ इतना बड़ा धोखा हुआ है। जब उन्हें इस साजिश का पता चला, तो उन्होंने वापसी की ठानी। इसी जिद ने जन्म दिया फिल्म ‘बॉबी’ को। यह एक ऐसी राज कपूर की फिल्म थी जिसने सब कुछ बदल दिया।
अपने बेटे ऋषि कपूर को लॉन्च करने और अपना सब कुछ वापस पाने के लिए राज कपूर ने ‘बॉबी’ पर अपना सबसे बड़ा दांव खेला। उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकार और शैलेंद्र सिंह जैसे नए गायक को मौका दिया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। फिल्म रिलीज से पहले उन्होंने एक नई रणनीति अपनाई और फिल्म के गाने रेडियो पर रिलीज कर दिए और कैसेट मुफ्त में बंटवाए। गानों ने ऐसी धूम मचाई कि फिल्म रिलीज से पहले ही ब्लॉकबस्टर घोषित हो गई। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। ‘बॉबी’ की सफलता ने राज कपूर के डूबे हुए करियर को न सिर्फ बचाया, बल्कि उन्हें पहले से भी बड़ी ऊंचाई पर पहुंचा दिया। हालांकि, ‘शोमैन’ के दिल में अपनी ड्रीम फिल्म की असफलता का दर्द जीवन भर एक कसक बनकर रहा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।






