
Bhikhari Thakur News: लोक कला की वो मशाल, जिसकी लौ आज भी बिहार की माटी में जीवंत है, भिखारी ठाकुर ने अपनी रचनाओं से समाज को राह दिखाई। उनकी जयंती पर आयोजित कार्यक्रम एक बार फिर उनकी अमर विरासत को नमन करने का अवसर लेकर आया।
सजग रचनाकार संस्थान द्वारा गुरुवार को भिखारी ठाकुर की 138वीं जयंती को कोईलवर-बबुरा पथ के नजदीक बड़हरा में विशेष रूप से मनाया गया। इस अवसर पर कलाकारों और साहित्य प्रेमियों ने उनके जीवन और कृतित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया और लोक जीवन की सच्चाई को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। उनके नाटक ‘बिदेसिया’ और ‘गबरघिचोर’ आज भी जनमानस में अपनी गहरी पैठ बनाए हुए हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उनकी कला और साहित्य ने भोजपुरी संस्कृति को एक नई पहचान दी।
देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि उनकी रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उनके समय में थीं। उनके गीत और नाटक समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं। वे एक ऐसे लोक कलाकार थे, जिन्होंने अपनी कला को केवल मनोरंजन का साधन नहीं बनाया, बल्कि समाज सुधार का माध्यम भी बनाया। यह एक महत्वपूर्ण बात है।
लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की रचनाएं आज भी प्रासंगिक
यह महान कलाकार सिर्फ एक कवि या नाटककार नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने अपनी कलम और कला के दम पर बदलाव की बयार लाई। उनकी कलाकृतियाँ ग्रामीण जीवन, रीति-रिवाजों और संघर्षों का जीवंत चित्रण करती हैं। आधुनिक दौर में भी उनकी रचनाओं का महत्व कम नहीं हुआ है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। युवा पीढ़ी को उनकी विरासत से प्रेरणा लेनी चाहिए ताकि भोजपुरी संस्कृति और लोक कलाओं का संरक्षण हो सके।
समाज सुधारक और जनकवि की अमिट छाप
यह कार्यक्रम इस बात का प्रतीक था कि बिहार अपनी महान विभूतियों को कितना सम्मान देता है। संस्थान ने भविष्य में भी ऐसे आयोजनों को जारी रखने का संकल्प लिया है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।


