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जनवरी, 2, 2026

महापर्व Magh Mela 2026: कल्पवास से मोक्ष तक का आध्यात्मिक पथ

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Magh Mela 2026: भारतीय संस्कृति में माघ मास का विशेष महत्व है, और इस पवित्र माह में प्रयागराज के त्रिवेणी संगम तट पर लगने वाला माघ मेला आस्था, संयम और साधना का एक अद्वितीय महापर्व है।

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# महापर्व Magh Mela 2026: कल्पवास से मोक्ष तक का आध्यात्मिक पथ

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## Magh Mela 2026: महत्व और सनातन परंपरा

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भारतीय सनातन धर्म में माघ मेले को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक माना गया है। यह वह समय है जब भक्तगण सांसारिक मोहमाया त्याग कर त्रिवेणी संगम के पावन जल में डुबकी लगाते हैं और कल्पवास के माध्यम से आत्मशुद्धि तथा मोक्ष की कामना करते हैं। यह केवल एक मेला नहीं, अपितु एक जीवनशैली है, जो तप, त्याग और समर्पण का संदेश देती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। शास्त्रों में वर्णित है कि इस माह में प्रयागराज के संगम पर स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।

### कल्पवास: एक दिव्य अनुभव

कल्पवास माघ मेले का अभिन्न अंग है, जहां श्रद्धालु एक माह तक संगम तट पर रहकर सात्विक जीवन जीते हैं। वे दिन में एक बार भोजन करते हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और निरंतर ध्यान-भजन में लीन रहते हैं। यह अवधि आत्मचिंतन, साधना और परमात्मा से जुड़ने का अनुपम अवसर प्रदान करती है।

### शाही स्नान की पवित्र तिथियां

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माघ मेले में कुछ विशेष स्नान तिथियां होती हैं, जिन्हें ‘शाही स्नान’ कहा जाता है। इन तिथियों पर लाखों श्रद्धालु, संत-महात्मा और कल्पवासी संगम में डुबकी लगाकर पुण्य अर्जित करते हैं। यद्यपि 2026 के लिए सटीक शाही स्नान तिथियां अभी निर्धारित नहीं हैं, सामान्यतः ये मकर संक्रांति, पौष पूर्णिमा, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि जैसे शुभ अवसरों पर पड़ती हैं। इन दिनों में स्नान का विशेष पुण्य माना जाता है।

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### मोक्ष की कामना और आध्यात्मिक लाभ

माघ मेले का मुख्य उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है। त्रिवेणी संगम पर स्नान करने और कल्पवास करने से न केवल शारीरिक शुद्धता प्राप्त होती है, बल्कि मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। यह पर्व हमें त्याग, सेवा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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### निष्कर्ष एवं उपाय

माघ मेला भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक जीवंत प्रतीक है। यह हमें प्रकृति से जुड़ने, स्वयं को समझने और ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को सुदृढ़ करने का अवसर देता है। जो लोग कल्पवास नहीं कर पाते, वे भी इस दौरान पवित्र नदियों में स्नान करके, दान-पुण्य करके और धार्मिक कार्यों में संलग्न होकर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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