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भारत में उच्च शिक्षा और रोजगार: क्यों बढ़ रहा है Employment News का संकट?

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Employment News: भारत में लाखों छात्र हर साल डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन अक्सर उन्हें अपनी पढ़ाई के बाद अच्छी नौकरी पाने में संघर्ष करना पड़ता है। एक हालिया रिपोर्ट ने उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच के बढ़ते अंतर को उजागर किया है, जो छात्रों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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भारत में उच्च शिक्षा और रोजगार: क्यों बढ़ रहा है Employment News का संकट?

भारत में हर साल लाखों छात्र कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से डिग्री लेकर निकलते हैं। उनकी उम्मीद होती है कि पढ़ाई पूरी होते ही उन्हें एक अच्छी नौकरी मिलेगी और वे अपने करियर की मजबूत शुरुआत कर पाएंगे। हालाँकि, जमीन पर हकीकत इससे काफी अलग है। हाल ही में टीमलीज एडटेक की एक रिपोर्ट ने भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था की इस कड़वी सच्चाई को सामने रखा है, जिसने शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ते अंतर को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा कर दी हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लगभग 75 प्रतिशत उच्च शिक्षा संस्थान अपने छात्रों को उद्योग-अनुकूल या नौकरी के लिए तैयार कौशल (जॉब-रेडी स्किल्स) प्रदान करने में विफल हो रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि छात्र डिग्री तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन उनमें वे व्यावहारिक क्षमताएँ नहीं होतीं जिनकी आज के नियोक्ताओं को आवश्यकता है। इस रिपोर्ट का शीर्षक ‘डिग्री फैक्ट्रियों से रोजगार केंद्रों तक’ है, जो स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि कई संस्थान केवल डिग्री देने का काम कर रहे हैं, न कि छात्रों को वास्तविक दुनिया के रोजगार के लिए तैयार करने का।

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घटता Employment News का दायरा और संस्थानों की भूमिका

रिपोर्ट के आँकड़े स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। केवल 16.67 प्रतिशत संस्थान ही ऐसे हैं जो अपने 76 से 100 प्रतिशत छात्रों को स्नातक होने के छह महीने के भीतर नौकरी दिला पाते हैं। यह आँकड़ा उन संस्थानों के लिए भी निराशाजनक है जो अक्सर खुद को बेहतर प्लेसमेंट प्रदान करने वाला बताते हैं। शिक्षा का उद्योग से जुड़ा होना आज के समय में अत्यधिक महत्वपूर्ण है, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि ऐसा बहुत कम जगहों पर हो रहा है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। सिर्फ 8.6 प्रतिशत संस्थानों ने ही स्वीकार किया कि उनके पाठ्यक्रम पूरी तरह से उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप हैं, जबकि 51 प्रतिशत से अधिक संस्थानों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके कोर्स का उद्योग से कोई तालमेल ही नहीं है। टीमलीज एडटेक के संस्थापक और सीईओ शांतनु रूज के अनुसार, यह स्थिति आकांक्षाओं और जमीनी हकीकत के बीच एक गहरे अंतर को दर्शाती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में संरचनात्मक रूप से कमजोर है।

व्यावहारिक अनुभव और रोजगार कौशल का अभाव

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कॉलेजों में उद्योग से जुड़े अनुभवी पेशेवरों (प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस) की भागीदारी बहुत कम है। केवल 7.56 प्रतिशत संस्थानों ने ही कई कोर्सों में ऐसे विशेषज्ञों को शामिल किया है। इसका परिणाम यह होता है कि अधिकांश छात्रों को वास्तविक दुनिया की नौकरी, बदलती भूमिकाओं और काम करने के तरीकों की सही समझ नहीं मिल पाती है। आज की कंपनियाँ केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि मान्यता प्राप्त इंडस्ट्री सर्टिफिकेट्स को भी महत्व देती हैं। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि 60 प्रतिशत से अधिक संस्थानों ने अपने पाठ्यक्रम में ऐसे सर्टिफिकेट्स को शामिल करने पर कभी विचार ही नहीं किया। इससे छात्र ऐसे रोजगार कौशल के बिना स्नातक हो जाते हैं, जिन्हें नियोक्ता तुरंत पहचान सकें और महत्व दें।

नौकरी के लिए तैयार होने में इंटर्नशिप और अनुभवात्मक शिक्षा की भूमिका बहुत अहम होती है। लेकिन यहाँ भी हालात कमजोर हैं। सिर्फ 9.4 प्रतिशत संस्थानों में ही सभी कोर्सों के लिए अनिवार्य इंटर्नशिप होती है, जबकि 37.8 प्रतिशत संस्थानों में इंटर्नशिप की कोई व्यवस्था ही नहीं है। इसके अलावा, लाइव इंडस्ट्री प्रोजेक्ट्स, जिनमें छात्र वास्तविक समस्याओं पर काम करते हैं, केवल 9.68 प्रतिशत संस्थानों में ही कराए जाते हैं। इन कमियों की वजह से बड़ी संख्या में छात्र बिना किसी व्यावहारिक अनुभव के नौकरी बाजार में कदम रखते हैं। ऐसे में क्लासरूम से वर्कप्लेस तक का सफर उनके लिए बेहद कठिन हो जाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। लेटेस्ट एजुकेशन और जॉब अपडेट्स के लिए यहां क्लिक करें https://deshajtimes.com/news/education/

पूर्व छात्रों का कमजोर नेटवर्क और भविष्य की चुनौतियाँ

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कॉलेज अपने पूर्व छात्रों के नेटवर्क का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं, जबकि यह उद्योग और संस्थानों के बीच एक मजबूत कड़ी हो सकता है। केवल 5.44 प्रतिशत संस्थानों ने ही बताया कि उनके पास सक्रिय एलुमनाई नेटवर्क है। इससे मेंटरशिप, रेफरल और अनौपचारिक भर्ती के अवसर काफी सीमित रह जाते हैं।

रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उद्योग के अनुरूप पाठ्यक्रम, आवश्यक इंटर्नशिप और नियोक्ताओं के साथ औपचारिक साझेदारी को अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य शर्त माना जाना चाहिए। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि समय रहते शिक्षा प्रणाली में बदलाव नहीं किए गए, तो भारत में एक ऐसा संकट खड़ा हो सकता है जहाँ डिग्रियों की संख्या तो बहुत होगी, लेकिन वास्तविक रोजगार के अवसर कम होंगे। यह असंतुलन न केवल छात्रों के भविष्य को नुकसान पहुँचाएगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर डालेगा।

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