शहर में स्वास्थ्य व्यवस्था दलाली, कुकर्मो पर टिक गई है। बात सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की करें वहां डॉक्टर सिर्फ वेतन उठा रहे मरीजों को देखने तक की उन्हें फुर्सत नहीं अपनी क्लीनिक है ना उसी में व्यस्त। निजी अस्पताल मरे मरीजों का खून भी बेच दे मगर शर्म कहां। हर निजी क्लीनिक के पास खुद की दवा दुकान। ऊपर डॉक्टर साहेब ने मंगवाया ऑपरेशन का पूरा सामान और नीचे की सीढ़ी से फिर वही सामान, दवा नीचे दुकान में वापस। लूट की पराकाष्ठा है साहेब स्वास्थ्य व्यवस्था के नाम पर। जिंदा गोश्त चबा रहे निजी अस्पताल वाले। डॉक्टर को देखकर डर लगता है। जो कभी भगवान लगते थे आज उनहें देखते ही शर्म आती है। डॉक्टरों की सुनिए वो कहते हैं, हक के लिए चिल्लाया तो अभद्र, थक गया तो गुनहगार, फीस मांगीं तो लालची, अस्पताल खोला तो व्यापार अरे डॉक्टरों जरा बताओ, कितनी दलाली करोगे मरीजों के खून से। शर्म करो और जिंदा रहने दो आम आदमियों को। तुम शपथ तो यही लेते हो आला थामने से पहले, पत्थर पूजने वाले दोहरे समाज, मैं भी एक जान हूं, हां, मैं एक डाक्टर हूं , मगर पहले एक इंसान हूं….मगर तुम्हारे अंदर की इंसानियत मर चुकी है। जरा खुद अपने सीने पर हाथ रखो और पूछो क्या ऑल इज वेल…नहीं हालात यही है, नेताओं की मेहरबानी, खादी की सफेदी में जितनी काली कमाई कर लो कर लो मैं तो यही कहूंगा
नेताओं के महाकुंभ में, सेवा नहीं प्रपंच बड़े हैं।
काग़ज़ के रावण मत फूंकों, ज़िंदा रावण बहुत पड़े हैं।








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