



मोबाइल चोरी: रेल की पटरियों पर दौड़ती ज़िंदगी के बीच, कब कोई आपकी जेब काट कर निकल जाए, पता भी न चले। भारतीय रेलवे स्टेशनों को अपराध का नया अड्डा बना चुके एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश हुआ है, जिसकी जड़ें भारत से बाहर नेपाल और बांग्लादेश तक फैली हैं।
आरा रेलवे स्टेशन मोबाइल चोरी गिरोह का भंडाफोड़: नेपाल-बांग्लादेश तक फैला नेटवर्क, पकड़े गए 4 बदमाश
रेलवे स्टेशनों पर मोबाइल चोरी: ऐसे होता था अंतरराष्ट्रीय काला कारोबार
बिहार के आरा जंक्शन समेत दानापुर रेल मंडल के कई प्रमुख स्टेशनों से मोबाइल फोन चोरी कर उन्हें नेपाल और बांग्लादेश में बेचने वाले एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। रविवार को आरपीएफ (रेलवे सुरक्षा बल) और जीआरपी (राजकीय रेलवे पुलिस) की संयुक्त कार्रवाई में चार मोबाइल चोरों को दबोचा गया, जिन्होंने पूछताछ के दौरान चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।
चोरों ने बताया कि भारत में IMEI (इंटरनेशनल मोबाइल इक्विपमेंट आइडेंटिटी) नंबर से पकड़े जाने के डर से वे चोरी के मोबाइलों का इस्तेमाल देश में नहीं करते। इसके बजाय, इन फोनों को सीमा पार नेपाल और बांग्लादेश में बेच दिया जाता है, जहाँ भारतीय ट्रैकिंग सिस्टम काम नहीं करता। यह एक बड़े पैमाने की अंतर्राष्ट्रीय तस्करी का हिस्सा है, जिससे अपराधियों को कानून की गिरफ्त से बचने में मदद मिलती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
आरपीएफ इंस्पेक्टर दीपक कुमार और जीआरपी थानाध्यक्ष रणधीर कुमार ने संयुक्त रूप से बताया कि यह एक संगठित आपराधिक गिरोह है, जिसका नेटवर्क बक्सर जिले के पुराना भोजपुर और पटना जैसे स्थानों से संचालित हो रहा था। यह गिरोह बड़े स्तर पर यात्रियों को अपना निशाना बनाता था।
भीड़भाड़ वाले स्टेशनों पर यात्रियों की जेब से मोबाइल निकाल लेना इनका मुख्य काम था। इसके बाद इन मोबाइलों को सुरक्षित रूप से सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचाया जाता था, जहां से इन्हें नेपाल और बांग्लादेश भेजा जाता था। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
नेपाल और बांग्लादेश में चोरी के फोन की मांग क्यों?
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, चोरों ने बताया कि विदेशों में इन मोबाइलों का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि वहाँ लगाए गए सिम कार्ड भारत के EMI ट्रैकिंग सिस्टम में नहीं दिखते। इस कारण चोरी हुए मोबाइल का पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है और अपराधी आसानी से कानून की पकड़ से बच निकलते हैं।
जांच में यह भी सामने आया है कि इस गिरोह का नेटवर्क काफी फैला हुआ है। स्थानीय स्तर पर मोबाइल चुराने वाले युवकों को प्रति मोबाइल एक निश्चित रकम दी जाती है। आम तौर पर अच्छी क्वालिटी के चोरी के मोबाइल कम से कम दो हजार रुपये में बेचे जाते हैं, जबकि उससे बेहतर क्वालिटी के मोबाइलों के पांच से बीस हजार रुपये तक मिल जाते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
मुख्य सरगना बड़े पैमाने पर इन मोबाइलों की अंतर्राष्ट्रीय तस्करी कर मोटा मुनाफा कमाते हैं। आरा जंक्शन के अलावा, दानापुर रेल मंडल के अन्य प्रमुख स्टेशनों जैसे दानापुर, पटना जंक्शन आदि को भी इस गिरोह ने अपना निशाना बना रखा था।
आरपीएफ और जीआरपी की टीमें अब इस मामले में गिरोह के अन्य सदस्यों और मुख्य सरगना की तलाश में जुट गई हैं। अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही तकनीकी साक्ष्यों और मोबाइल चोरी के पुराने मामलों को खंगाल कर सरगना तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है। सीमावर्ती इलाकों में भी सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया गया है ताकि नेपाल और बांग्लादेश की ओर होने वाली इस अवैध तस्करी पर अंकुश लगाया जा सके।


