



बसंत पंचमी: प्रकृति के कैनवास पर जब पीत रंग बिखरता है, ज्ञान की देवी वीणा से सुर साधती हैं, तब मिथिला के गलियारों में फागुन के आगमन का उद्घोष होता है। यह सिर्फ एक पर्व नहीं, उत्सवों की लंबी श्रृंखला का शुभारंभ है।
अहल्यास्थान स्थित दुर्गा भवन में शुक्रवार को आयोजित सरस्वती पूजनोत्सव के अवसर पर देर शाम बजरंग म्यूजिकल ग्रुप के ठाकुर रघुवीर और रघुनंदन ने अपनी मंडली के साथ फगुआ गीतों पर जोश भरी ताल ठोकी। ‘रसिया ना माने रे मेरे नैनों में डाले अबीर’ और ‘होली खेले रघुवीरा बिरज में होली खेले रघुवीरा’ जैसे पारंपरिक गीतों से श्रोता सराबोर हो गए। यह आयोजन महज एक सांस्कृतिक संध्या नहीं, बल्कि मिथिला की लोक परंपराओं की जीवंत प्रस्तुति थी, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
मिथिला में बसंत पंचमी का दिन न केवल ज्ञान की देवी सरस्वती की आराधना का है, बल्कि यह पारंपरिक रूप से होली के आगमन का संकेत भी देता है। बसंत पंचमी से लेकर होली के दिन तक मिथिला में फागुन के रंग और फगुआ गीतों का विशेष माहौल छा जाता है।
बसंत पंचमी से शुरू होता है फागुनी उत्सव
इस दिन से गांवों में शाम को ‘फगुआ’ गाने की परंपरा शुरू हो जाती है। लोग ढोलक, झाल के साथ मंडली बनाकर होली के गीत गाते हैं। बसंत ऋतु की शुरुआत के साथ ही वातावरण में एक अद्भुत उल्लास भर जाता है। घरों और मंदिरों में भगवान को गुलाल अर्पित करने की प्रक्रिया इसी दिन से प्रारंभ होती है, जो होलिका दहन और होली तक अनवरत चलती है।
मैथिली होली गीतों में ‘जोगीरा’ का अपना विशेष महत्व है। इसके साथ ही, सीता-राम और राधा-कृष्ण के होली खेलने का वर्णन करने वाले ‘मिथिला में राम खेलय होरी मिथिला में’ जैसे पारंपरिक गीत भी खूब गाए जाते हैं। यह गायन शैली क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर का अटूट हिस्सा है, जिसे पीढ़ियों से संजोया गया है।
मिथिला में बसंत पंचमी से होली तक लगभग चालीस दिनों तक लोक संगीत और रंगों का यह सिलसिला चलता है, जिसे “होली का ताल” या “फगुआ के बहार” के रूप में भी जाना जाता है। इस दौरान हर गली-मोहल्ले में ‘मिथिला की होली’ का रंग चढ़ने लगता है, लोककला और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/ आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
मिथिला की अनोखी चालीस दिनी फागुनी परंपरा
यह परंपरा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। इस दौरान लोग एक-दूसरे के घर जाकर बधाई देते हैं और साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।



