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मार्च, 7, 2026
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गुरु रविदास जयंती 2026: संत रविदास – ज्ञान, भक्ति और समानता के प्रतीक

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Guru Ravidas Jayanti 2026: भारतीय संत परंपरा के उज्ज्वल नक्षत्र, संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज की जयंती हर वर्ष माघ पूर्णिमा को अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह पावन अवसर हमें उनके ज्ञान, भक्ति और समानता के दिव्य संदेशों का स्मरण कराता है।

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गुरु रविदास जयंती 2026: संत रविदास – ज्ञान, भक्ति और समानता के प्रतीक

गुरु रविदास जयंती 2026 का महत्व और संत रविदास का जीवन दर्शन

संत रविदास का जीवन दर्शन हमें प्रेम, मन की पवित्रता और गुरु की महत्ता का पाठ पढ़ाता है। उनके पद और दोहे आज भी समाज को एक नई दिशा प्रदान करते हैं, विशेषकर सामाजिक समरसता और भाईचारे को बढ़ावा देने में उनका योगदान अतुलनीय है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उनका जन्म माघ पूर्णिमा संवत् 1433 को काशी में हुआ था। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेकों कष्ट सहे, परंतु अपने सिद्धांतों से कभी विचलित नहीं हुए।

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रविदास जी ने अपनी वाणियों के माध्यम से जाति-पाति के भेद का खंडन किया और सभी मनुष्यों को समान मानने का संदेश दिया। वे कहते थे कि कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों से महान होता है, न कि अपने जन्म से। उनकी शिक्षाओं में ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ का सिद्धांत प्रमुख है, जो आंतरिक शुद्धता और सद्कर्मों पर बल देता है। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त है और उसकी प्राप्ति के लिए आडंबरों की नहीं, बल्कि सच्चे मन से की गई भक्ति की आवश्यकता है। उनके अनुयायी उन्हें एक महान संत, दार्शनिक और समाज सुधारक के रूप में पूजते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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गुरु रविदास जयंती का पर्व हमें संत रविदास जी के जीवन और उनके अमूल्य विचारों को स्मरण करने का अवसर देता है। यह दिन उनके अनुयायियों द्वारा बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। इस दिन गुरु रविदास जी के संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है, ताकि समाज में प्रेम, भाईचारा और सामाजिक समरसता की भावना और प्रबल हो सके। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें

संत रविदास जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति या वर्ण के आधार पर नहीं, बल्कि उसके गुणों और कर्मों के आधार पर होना चाहिए। उनके उपदेश आज भी प्रासंगिक हैं और हमें एक ऐसे समाज के निर्माण की प्रेरणा देते हैं जहाँ सभी समान हों और प्रेम व भाईचारे के साथ रहें। उनकी शिक्षाओं का पालन करना ही इस महान संत के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस पावन अवसर पर हमें उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए, जिससे हमारा जीवन और समाज दोनों ही उन्नत हो सकें।

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