

Maithili Poetry: हृदय के अंतर्मन से उपजी भावनाएँ जब शब्दों का आकार लेती हैं, तब कोई ‘चिनवारक फूल’ खिल उठता है, अपनी सुगंध से साहित्य संसार को महकाते हुए। प्रतिमा झा ‘प्रांशी’ की नई कृति इसी दिव्य सृजन का प्रमाण है।
Maithili Poetry: ‘चिनवारक फूल’ से प्रतिमा झा ‘प्रांशी’ ने रौशन किया मैथिली भजन का आकाश!
भजन-सृजन एक गहन साधना है, जो सहृदय व्यक्ति के एकांतिक क्षणों में शांत चित्त और प्रखर प्रतिभा के संयोग से प्रस्फुटित होती है। यह कोई साधारण कार्य नहीं, बल्कि एक श्रमसाध्य तपस्या है। इसी दिशा में प्रतिमा झा ‘प्रांशी’ ने अपनी ललित लेखनी से ‘चिनवारक फूल’ नामक गीति-काव्य भजन की रचना कर एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह कृति मैथिली साहित्य के भंडार को और समृद्ध करती है, और आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह संग्रहणीय, गेय और सर्वथा सराहनीय है।



Maithili Poetry: आस्था और प्रेम का अनुपम संगम ‘चिनवारक फूल’
‘चिनवारक फूल’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास, आंतरिक साधना, सत्य और प्रेम का प्रतीक है। यह उस दिव्यता से जुड़ा है जहाँ जगत जननी, शक्ति स्वरूपा माँ साक्षात् विभिन्न रूपों में विराजमान रहती हैं – दुर्गा, तारा, श्यामा, सरस्वती आदि अनेक प्रकट-अप्रकट देवियाँ अपनी कृपा दृष्टि से लोक मानस को आनंदित करती रहती हैं। इसी प्रकार, भावाभिभूत होकर आस्तिकों का ध्यान अन्य देवी-देवताओं की ओर भी जाता है, चाहे वे विघ्नहर्ता गणेश हों या औढरदानी सदाशिव।

पुस्तक का विमोचन एक फरवरी को पटना में आधुनिक मिथिलानी के मंच पर मणिकांत झा, जयदेव मिश्र, प्रेमलता मिश्रा, मीना मिश्र, नविता झा, जूली झा, सुनीता झा और डॉ हरेंद्र मोहन के हाथों हुआ।
‘प्रांशी’ नाम ‘देवी’ अथवा ‘लक्ष्मी’ का पर्याय है, और प्रतिमा के साथ ‘प्रांशी’ का यह संयोग अद्भुत है। उनके द्वारा ‘चिनवारक फूल’ का आख्यान, स्मरण, ध्यान और पूजन के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा है, इसमें कोई असंगति या अतिशयोक्ति नहीं। अपने नाम के अनुरूप, ज्ञान गंगा में अवगाहन करते हुए, मनोरथ भाव-सामग्री के साथ ‘प्रांशी’ का मैथिली की देहरी पर यह प्रवेश यथार्थतः स्वागत योग्य है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

गीतों में माधुर्य, कोमलता और भाव प्रवणता
सामवेद से निसृत गीत-गायन भला किसके हृदय को आह्लादित नहीं करता? गीत-रचनाकार ‘प्रांशी’ के एक-एक पद में माधुर्य, कोमलता, सरसता, मनोहरता, भावप्रवणता और प्रभावोत्पादकता है। इसका प्रभाव सहृदय काव्य-रसिकों के हृदय-मंदिर को चंद्र और दिवाकर की भाँति सदैव प्रकाशित-प्रतिभासित करता रहेगा। यह कृति न केवल कलात्मक रूप से समृद्ध है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी गहरी है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
पूर्व अध्यक्ष, स्नातकोत्तर मैथिली विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वरनगर, दरभंगा के डॉ. धीरेन्द्रनाथ मिश्र ने ‘चिनवारक फूल’ की रचनाकार प्रतिमा झा ‘प्रांशी’ के प्रति उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए इसे एक महत्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धि बताया है। उन्होंने इस कृति की गहरी आध्यात्मिक और काव्यात्मक महत्ता को रेखांकित किया। यह कृति सिर्फ कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है जो पाठकों को आत्मिक शांति प्रदान करती है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।


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