



भारतीय रुपये की चाल अब सिर्फ घरेलू कारकों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वैश्विक आर्थिक बदलावों और भू-राजनीतिक समीकरणों का भी गहरा असर होता है। शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट दर्ज की गई, जिससे उन निवेशकों की चिंता बढ़ गई है जो अस्थिर वैश्विक व्यापार परिदृश्य में सुरक्षित निवेश की तलाश में हैं।
अमेरिकी डॉलर के मजबूत होते ही चरमराया भारतीय रुपये-डॉलर संतुलन: क्या है वजह?
रुपये-डॉलर पर दबाव क्यों बढ़ा: वैश्विक कारक और व्यापार समझौते का असर
भारतीय रुपया हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 8 पैसे कमजोर होकर 90.69 पर बंद हुआ। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब एक दिन पहले रुपये में 17 पैसे की मजबूती दर्ज की गई थी। घरेलू शेयर बाजारों में नकारात्मक माहौल और अमेरिकी डॉलर के मजबूत रुख ने रुपये पर दबाव बनाए रखा, जिससे निवेशकों में सतर्कता का माहौल है।
विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, डॉलर की वैश्विक मजबूती के कारण उभरते बाजारों की मुद्राओं, विशेषकर रुपये में तेजी की संभावना सीमित हो गई है। बाजार ने भले ही शुरुआत में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का सकारात्मक स्वागत किया हो, लेकिन व्हाइट हाउस द्वारा जारी ‘फैक्ट शीट’ ने नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इस दस्तावेज़ में समझौते की शर्तों का उल्लेख है, जिनमें भारत द्वारा कई अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर शुल्क खत्म करने या कम करने की बात शामिल है। इससे व्यापार संतुलन और घरेलू उद्योगों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर निवेशकों में सतर्कता बढ़ी है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
इस बीच, वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने यह स्पष्ट किया है कि भारत ने व्यापार वार्ताओं में अपने संवेदनशील क्षेत्रों की पूरी सुरक्षा की है और अंतरिम समझौते के तहत महत्वपूर्ण खंडों को संरक्षित रखा गया है। उन्होंने यह भी बताया कि दोनों देशों की टीमें साझा बयान को कानूनी समझौते का रूप देने पर काम कर रही हैं, जिसके मार्च के अंत तक अंतिम रूप लेने की संभावना है। यह आश्वासन निवेशकों को कुछ राहत दे सकता है, लेकिन वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।
गुरुवार को भारतीय रुपया 17 पैसे की मजबूती के साथ 90.61 पर बंद हुआ था, जिससे बाजार में कुछ आशावादी माहौल था। हालांकि, शुक्रवार को डॉलर सूचकांक में 0.02 प्रतिशत की बढ़त के साथ यह 96.94 पर पहुंच गया, जिसने अमेरिकी डॉलर की मजबूती को बरकरार रखा और रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाला।
घरेलू शेयर बाजार और कच्चे तेल पर असर
घरेलू शेयर बाजारों में भी गिरावट का रुख देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 683.72 अंक गिरकर 82,991.20 पर और निफ्टी 207.15 अंक टूटकर 25,600.05 पर पहुंच गया। यह गिरावट वैश्विक आर्थिक संकेतों और रुपये पर बढ़ते दबाव का सीधा परिणाम है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव 0.16 प्रतिशत गिरकर 67.41 डॉलर प्रति बैरल रहा, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में हल्की नरमी दिखी। यह एक सकारात्मक संकेत हो सकता है, लेकिन डॉलर की मजबूती के आगे इसका प्रभाव सीमित रहा। रियल-टाइम बिजनेस – टेक्नोलॉजी खबरों के लिए यहां क्लिक करें। विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने गुरुवार को 108.42 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे, जो पूंजी प्रवाह के लिए एक अच्छा संकेत था। इसके बावजूद, वैश्विक संकेतों और अमेरिकी डॉलर की लगातार मजबूती ने भारतीय रुपये पर दबाव बनाए रखा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
कुल मिलाकर, भारतीय रुपया इस सप्ताह उतार-चढ़ाव भरे माहौल से गुजरा है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों, वैश्विक व्यापार समझौतों और घरेलू आर्थिक आंकड़ों का संयुक्त प्रभाव रुपये की भविष्य की चाल तय करेगा। विश्लेषक मौजूदा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच रुपये पर दबाव बने रहने की आशंका जता रहे हैं, लेकिन सरकार और आरबीआई के हस्तक्षेप से इसे स्थिर करने के प्रयास जारी रहेंगे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।



