

Mahashivratri Katha: देवों के देव महादेव और आदिशक्ति के दिव्य प्रेम और त्याग की यह गाथा युगों-युगों से भक्तों को प्रेरणा देती आ रही है, जो हमें धर्म, सत्य और आत्मसम्मान के महत्व का बोध कराती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह कथा केवल प्रेम की ही नहीं, अपितु आत्मसम्मान, शक्ति और सत्य के पक्ष में खड़े होने की उस दिव्य चेतना की है, जहाँ सती का त्याग सृष्टि के इतिहास में अमर हो गया। शिव और शक्ति के इस अद्वितीय मिलन और विछोह की कहानी हर भक्त के हृदय में बसी है।
महाशिवरात्रि कथा: शिव-सती के अमर प्रेम और त्याग की अलौकिक गाथा
महाशिवरात्रि कथा: राजा दक्ष के अहंकार का विनाश और सती का त्याग
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। दक्ष, ब्रह्मा के पुत्र थे और अपनी पुत्री सती का विवाह महादेव से होने के कारण वे उनसे ईर्ष्या रखते थे। उन्होंने जानबूझकर अपने यज्ञ में सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, सिवाय महादेव और अपनी पुत्री सती के। सती को जब इस यज्ञ का समाचार मिला, तो उन्होंने अपने पिता के घर जाने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया कि बिना आमंत्रण के जाना उचित नहीं, किंतु सती का मन नहीं माना। अंततः महादेव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी।
सती जब अपने पिता के यज्ञ स्थल पर पहुंचीं, तो उन्हें अपने पति के अपमान का सामना करना पड़ा। प्रजापति दक्ष ने भरी सभा में भगवान शिव का घोर अपमान किया। सती अपने पति के इस अपमान को सहन न कर सकीं। आत्मसम्मान की रक्षा और अपने पति के प्रति अगाध प्रेम के चलते उन्होंने वहीं यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। इस हृदयविदारक घटना से पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया।
महादेव का तांडव और रुद्र अवतार
जब भगवान शिव को सती के आत्मदाह का समाचार मिला, तो वे क्रोध से विकल हो उठे। उनका तीसरा नेत्र खुल गया और उन्होंने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया। अपने प्रिय पत्नी के वियोग और अपमान से क्रोधित होकर, उन्होंने अपने बालों से वीरभद्र को उत्पन्न किया, जिसने दक्ष के यज्ञ को भंग कर दिया और प्रजापति दक्ष का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। भगवान शिव ने सती के जले हुए शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विक्षिप्त होकर तांडव नृत्य किया, जिससे सृष्टि कांप उठी। देवताओं ने प्रार्थना की, जिसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
पुनर्जन्म और पार्वती का तप
सती ने अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय और मैना के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। बचपन से ही उनका मन भगवान शिव में रमा हुआ था। उन्होंने महादेव को पुनः पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से तीनों लोक कांप उठे। अंततः महादेव प्रसन्न हुए और उन्होंने पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इस प्रकार, शिव-शक्ति का यह दिव्य मिलन फिर से हुआ, जिसने सृष्टि में संतुलन स्थापित किया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी सर्वोच्च त्याग भी करना पड़ता है। सती का बलिदान आत्मसम्मान और पतिव्रत धर्म का प्रतीक है।
निष्कर्ष और उपदेश
महाशिवरात्रि का पर्व इसी शिव और शक्ति के मिलन का उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि अहंकार का अंत निश्चित है और प्रेम, त्याग व श्रद्धा से ही परमात्मा की प्राप्ति संभव है। यह पावन कथा हमें जीवन में सत्य के मार्ग पर चलने और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देती है। यह पवित्र संबंध हमें बताता है कि प्रेम और समर्पण से जीवन में आने वाली हर बाधा को पार किया जा सकता है।
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