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फ़रवरी, 20, 2026
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Holashtak 2026: होलाष्टक 2026 का धार्मिक महत्व और सावधानियां

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Holashtak 2026: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से लेकर पूर्णिमा तिथि तक के आठ दिनों को होलाष्टक के नाम से जाना जाता है। यह अवधि आध्यात्मिकता और तपस्या के लिए विशेष मानी जाती है, किंतु शुभ कार्यों के लिए इसे त्याज्य माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन आठ दिनों में कुछ विशेष प्रकार के मांगलिक कार्य करना वर्जित माना गया है, जिसका विस्तृत वर्णन हम आगे करेंगे।

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Holashtak 2026: होलाष्टक 2026 का धार्मिक महत्व और सावधानियां

Holashtak 2026: क्या है होलाष्टक 2026 में वर्जित कार्य?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भक्त प्रह्लाद को उनके पिता हिरण्यकश्यप ने फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक अनेक कष्ट दिए थे। इन आठ दिनों में प्रह्लाद को कई प्रकार की यातनाएं दी गईं, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से वे हर बार सुरक्षित रहे। अंततः पूर्णिमा के दिन होलिका दहन के साथ हिरण्यकश्यप का अंत हुआ और भक्त प्रह्लाद की विजय हुई। इसी कारण इन आठ दिनों को “होलाष्टक” कहा जाता है और इन्हें शुभ कार्यों के लिए अशुभ समय माना गया है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, उपनयन संस्कार, नए व्यापार का आरंभ, भवन निर्माण का उद्घाटन जैसे कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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होलाष्टक का धार्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व

होलाष्टक की अवधि में वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का संचार अधिक माना जाता है, जिससे किए गए शुभ कार्यों में बाधाएं आ सकती हैं या उनका अपेक्षित फल नहीं मिलता। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी, होलाष्टक के इन आठ दिनों में सभी प्रमुख ग्रह उग्र अवस्था में होते हैं, जिससे शुभ कार्यों के लिए यह कालखंड अनुकूल नहीं रहता। इसलिए, इस दौरान ईश्वर की आराधना, मंत्र जप, तपस्या और दान-पुण्य को विशेष महत्व दिया जाता है। यह समय आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत श्रेष्ठ है।

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होलाष्टक 2026: प्रमुख तिथियां और ध्यान रखने योग्य बातें

वर्ष 2026 में होलाष्टक का आरंभ फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि, यानी 24 फरवरी 2026 को होगा और इसका समापन फाल्गुन पूर्णिमा तिथि, यानी 3 मार्च 2026 को होलिका दहन के साथ होगा। इन आठ दिनों में विशेष सावधानियां बरतना आवश्यक है:

  • नए कार्य, व्यवसाय या किसी भी प्रकार के नए उद्यम का शुभारंभ न करें।
  • विवाह, सगाई जैसे मांगलिक कार्यों से बचें।
  • गृह प्रवेश, भूमि पूजन या भवन निर्माण का आरंभ इन दिनों में वर्जित है।
  • बच्चों से संबंधित संस्कार जैसे मुंडन, जनेऊ (उपनयन) आदि न कराएं।
  • इस अवधि में अधिक से अधिक समय ईश्वर भक्ति, मंत्र जप और ध्यान में लगाएं।
  • गरीबों और जरूरतमंदों को दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
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निष्कर्ष एवं उपाय

होलाष्टक का यह समय भले ही मांगलिक कार्यों के लिए त्याज्य हो, किंतु यह आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक विकास का अनमोल अवसर प्रदान करता है। इन दिनों में भगवान विष्णु, भगवान शिव और श्री कृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं और जीवन में सकारात्मकता आती है। मान्यता है कि इस अवधि में महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है और ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। इसलिए, इन आठ दिनों को भय के बजाय भक्ति और साधना के भाव से देखें और ईश्वर की शरण में रहकर स्वयं को ऊर्जावान बनाएं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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