

Holika Dahan: फाल्गुन पूर्णिमा की पावन तिथि पर होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह पर्व होलिका और भक्त प्रहलाद की पौराणिक कथा से जुड़ा है, जिसमें अग्नि भी भगवान विष्णु के भक्त का बाल बांका न कर सकी और अधर्मी होलिका स्वयं भस्म हो गई। प्रत्येक वर्ष की भांति, वर्ष 2026 में भी यह पावन पर्व उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। इस विशेष अवसर पर, अग्नि में उन सभी बुराइयों को स्वाहा किया जाता है, जिनसे मुक्ति पाना आवश्यक है। हालांकि, होलिका दहन की अग्नि में कुछ विशेष प्रकार की लकड़ियों का उपयोग वर्जित माना गया है, जिनकी अनदेखी से पूजन का शुभ फल प्राप्त नहीं होता।
Holika Dahan 2026: जानें होलिका दहन में किन लकड़ियों को जलाना है अशुभ
Holika Dahan 2026 का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व
होली से ठीक एक दिन पूर्व, फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या पर होलिका दहन की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दिन अग्नि जलाकर उसमें बुराइयों और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश किया जाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। होलिका दहन का यह पावन अवसर भक्तों को आत्मशुद्धि और नई शुरुआत का संदेश देता है। ज्योतिषीय गणनाओं और धार्मिक मान्यता के अनुसार, होलिका दहन के लिए कुछ विशेष लकड़ियों का प्रयोग शुभ फलदायी होता है, जबकि कुछ लकड़ियों को जलाना निषेध माना गया है।
होलिका दहन 2026: कब और कैसे करें पूजन?
वर्ष 2026 में होलिका दहन का पर्व 03 मार्च, मंगलवार को मनाया जाएगा। इस दिन संध्याकाल में शुभ मुहूर्त में होलिका का पूजन कर उसे प्रज्वलित किया जाता है।
शुभ मुहूर्त 2026
| तिथि | समय (भारतीय समयानुसार) |
|---|---|
| फाल्गुन पूर्णिमा प्रारंभ | 03 मार्च 2026, सुबह 09:50 बजे से |
| फाल्गुन पूर्णिमा समाप्त | 04 मार्च 2026, सुबह 08:35 बजे तक |
| होलिका दहन मुहूर्त | 03 मार्च 2026, शाम 06:20 बजे से रात 08:50 बजे तक |
| अवधि | 02 घंटे 30 मिनट |
पूजन विधि:
- होलिका दहन से पूर्व, एक लोटे में जल, रोली, अक्षत, फूल, गुलाल, कच्चे सूत का धागा, बताशे, नई फसल के गेहूं की बालियां और नारियल लेकर होलिका की परिक्रमा करें।
- होलिका पर कच्चा सूत सात बार लपेटते हुए परिक्रमा करें।
- जल, रोली, अक्षत, फूल और अन्य सामग्री होलिका को अर्पित करें।
- अग्नि प्रज्वलित होने के बाद, परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करें।
- होलिका की अग्नि में भूने हुए चने, गेहूं की बालियां, नारियल आदि अर्पित करें।
होलिका दहन में वर्जित लकड़ियां
हमारे शास्त्रों और धार्मिक मान्यता के अनुसार, होलिका दहन की अग्नि में कुछ विशेष पेड़ों की लकड़ी का उपयोग नहीं करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इन पवित्र पेड़ों की लकड़ी जलाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और देवी-देवता अप्रसन्न हो सकते हैं। इन पेड़ों को पूजनीय माना जाता है और इन्हें जलाना अशुभ फलदायी होता है।
- पीपल: पीपल के पेड़ को अत्यंत पवित्र माना गया है और इसमें देवताओं का वास होता है।
- बरगद: बरगद का पेड़ भी धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे जलाना वर्जित है।
- आम: आम के पेड़ की लकड़ी का उपयोग यज्ञ आदि शुभ कार्यों में किया जाता है, लेकिन होलिका दहन में इसे नहीं जलाना चाहिए।
- बेल: बेल वृक्ष भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इसकी लकड़ी को भी होलिका दहन में वर्जित माना गया है।
- आंवला: आंवले के पेड़ को भी पूजनीय माना जाता है। इसकी लकड़ी का उपयोग भी होलिका दहन में न करें।
इन लकड़ियों के बजाय, होलिका दहन में गूलर, बबूल, आक या अरंडी के पेड़ की सूखी लकड़ियों का उपयोग करना चाहिए, जो प्रकृति में आसानी से उपलब्ध होती हैं और धार्मिक दृष्टि से भी स्वीकार्य हैं।
पौराणिक कथा
होलिका दहन की कथा भक्त प्रहलाद और उसके पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी है। हिरण्यकश्यप स्वयं को ईश्वर मानता था और चाहता था कि सभी उसकी पूजा करें, लेकिन उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने के कई प्रयास किए, जिनमें से एक उसकी बहन होलिका को सौंपा गया। होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। उसने प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश किया, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद सुरक्षित रहे और होलिका स्वयं अग्नि में भस्म हो गई। यह कथा हमें सत्य और धर्म की विजय का संदेश देती है।
उपाय और सावधानियां
होलिका दहन की अग्नि में सरसों के दाने, काले तिल, जौ और गुड़ अर्पित करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मकता दूर होती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस दौरान किसी भी प्रकार के टोने-टोटके से बचें और पवित्र मन से ईश्वर का स्मरण करें। होलिका दहन के बाद उसकी राख को घर लाना शुभ माना जाता है, इसे घर के चारों कोनों में छिड़कने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।
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