

Sanskrit Exam: उम्र छोटी और काम बड़े… दरभंगा की एक नन्हीं सी बच्ची ने संस्कृत के श्लोकों की ऐसी तान छेड़ी है कि पूरा देश वाह-वाह कर उठा है। अपनी प्रतिभा के दम पर उसने राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित परीक्षा में स्वर्ण पदक जीतकर न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे बिहार का नाम रोशन किया है।
दरभंगा। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर व्याकरण विभाग में सहायक प्राचार्य के पद पर कार्यरत डॉ. यदुवीर स्वरूप शास्त्री की होनहार पुत्री नैवेद्या शास्त्री ने एक बार फिर अपनी मेधा का परचम लहराया है। संस्कृत भारती उत्तर प्रदेश न्यास, वाराणसी द्वारा हर वर्ष आयोजित की जाने वाली प्रतिष्ठित अखिल भारतीय शलाका परीक्षा में नैवेद्या ने स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। यह एक बड़ी उपलब्धि है।
नई दिल्ली के श्री जयराम ब्रह्मचर्य आश्रम में रविवार को इस परीक्षा का आयोजन किया गया था। कनिष्ठ संवर्ग की इस शलाका परीक्षा में देशभर से आए 40 स्कूली बच्चों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, जिसमें विषय विशेषज्ञों के पैनल ने गहन मूल्यांकन के बाद नैवेद्या को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया। आपको बता दें कि नैवेद्या दरभंगा की निजी स्कूल में छठी कक्षा की छात्रा है और इससे पहले भी वह स्थानीय स्तर पर कई पुरस्कार जीत चुकी है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस जूनियर स्तर की शलाका परीक्षा में कक्षा सात तक के विद्यार्थी शामिल हुए थे।
नैवेद्या ने राष्ट्रीय स्तर पर मनवाया अपनी प्रतिभा का लोहा
इस अखिल भारतीय स्तर की प्रतियोगिता में शीर्ष स्थान प्राप्त करने पर आयोजन समिति द्वारा नैवेद्या को स्वर्ण पदक के साथ-साथ बीस हजार रुपये की नकद राशि, एक चांदी की शलाका और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। प्राच्य विषयों में गहरी रुचि रखने वाली नैवेद्या का कहना है कि संस्कृत पढ़ने से एक अलग ही नैसर्गिक और आत्मिक शांति की अनुभूति होती है। वेद और अन्य प्राच्य शास्त्रों के कई गूढ़ श्लोक उसे कंठस्थ हैं, जिन्हें वह सहजता से सुनाती है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/
क्या है यह Sanskrit Exam और शलाका परीक्षा?
शलाका परीक्षा कोई सामान्य परीक्षा नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की एक अत्यंत वैज्ञानिक एवं परिष्कृत मूल्यांकन विधि है। इस विधि का उद्देश्य केवल ज्ञान को परखना नहीं, बल्कि शास्त्रीय विषयों को कंठस्थ रखने की क्षमता का भी आकलन करना है। इसे शास्त्र संरक्षण की एक मुख्य वाहिका के रूप में भी देखा जाता है।
इस परीक्षा में प्रतिभागी की स्मरण शक्ति के साथ-साथ विषय की गहराई, संदर्भ, पूर्ववर्ती और अनुवर्ती श्लोकों की समझ और लेखक के मूल आशय को समझने की क्षमता को भी परखा जाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह केवल रटने की क्षमता की परीक्षा नहीं, बल्कि ज्ञान के व्यापक परीक्षण का एक माध्यम है। आमतौर पर यह परीक्षा व्याकरण, न्याय और अन्य वैदिक शास्त्रों में निपुणता के मूल्यांकन के लिए आयोजित की जाती है।
विश्वविद्यालय में खुशी की लहर, दी गईं शुभकामनाएं
अखिल भारतीय स्तर की अमरकोश शलाका परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर नैवेद्या और उनके पिता डॉ. यदुवीर स्वरूप शास्त्री को कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभाग के प्राध्यापकों ने बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। बधाई देने वालों में प्रो. दयानाथ झा, प्रो. दिलीप कुमार झा, प्रो. पुरेन्द्र वारिक, डॉ. साधना शर्मा, डॉ. एल सविता आर्या, डॉ. धीरज पांडेय, डॉ. शंभूशरण तिवारी, डॉ. रितेश चतुर्वेदी, डॉ. संतोष तिवारी, और डॉ. संतोष पासवान समेत कई अन्य संस्कृत विद्वान शामिल हैं। सभी ने नैवेद्या के उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।



