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फ़रवरी, 23, 2026
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NEET-PG Cut-off विवाद: क्या गुणवत्ता पर पड़ेगा असर, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?

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NEET-PG Cut-off: देशभर में मेडिकल पोस्टग्रेजुएट सीटों के लिए हाल ही में घोषित नीट-पीजी कट-ऑफ में हुई बड़ी कमी ने चिकित्सा शिक्षा के भविष्य पर एक नई बहस छेड़ दी है।

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# NEET-PG Cut-off विवाद: क्या गुणवत्ता पर पड़ेगा असर, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?

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## NEET-PG Cut-off में कमी: सरकार का पक्ष और अहम बातें

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देशभर में मेडिकल पोस्टग्रेजुएट सीटों के लिए हाल ही में घोषित नीट-पीजी कट-ऑफ में हुई बड़ी कमी ने चिकित्सा शिक्षा के भविष्य पर एक नई बहस छेड़ दी है। मेडिकल छात्रों, अभिभावकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस फैसले से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी। कई लोगों ने आशंका जताई कि कम अंक पर पीजी में दाखिला मिलने से भविष्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों के स्तर पर असर पड़ सकता है।

इसी बीच, केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा है कि NEET-PG का प्राथमिक उद्देश्य किसी छात्र की न्यूनतम डॉक्टर के रूप में योग्यता तय करना नहीं है। सरकार के अनुसार, डॉक्टर बनने की वास्तविक पात्रता एमबीबीएस की पढ़ाई और अनिवार्य इंटर्नशिप सफलतापूर्वक पूरी करने के साथ ही सिद्ध हो जाती है। नीट-पीजी केवल एक प्रवेश परीक्षा है, जिसका मुख्य लक्ष्य सीमित पोस्टग्रेजुएट (एमडी/एमएस) सीटों के लिए उम्मीदवारों की एक मेरिट लिस्ट तैयार करना है।

इस परीक्षा में भाग लेने वाला प्रत्येक उम्मीदवार पहले से ही एक योग्य चिकित्सक होता है। उन्होंने 4.5 वर्ष की एमबीबीएस शिक्षा पूर्ण की होती है और इसके उपरांत एक वर्ष की अनिवार्य इंटर्नशिप भी कर चुके होते हैं। एमबीबीएस डिग्री प्राप्त करने के लिए छात्रों को सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों परीक्षाओं में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक प्राप्त करना आवश्यक होता है। इसका अर्थ है कि NEET-PG देने से पूर्व ही उम्मीदवार आवश्यक चिकित्सा प्रशिक्षण और पात्रता हासिल कर चुके होते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

## वर्तमान कट-ऑफ और सीटों के खाली रहने का कारण

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इस वर्ष NEET-PG के लिए न्यूनतम अंक उल्लेखनीय रूप से कम रखे गए हैं। सामान्य और ईडब्ल्यूएस वर्ग के उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम अंक 103 निर्धारित किए गए हैं, जबकि सामान्य पीडब्ल्यूडी श्रेणी के आवेदकों के लिए यह 90 अंक है। वहीं, अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए न्यूनतम अंक -40 तय किया गया है। इन अंकों में कमी से अब पहले की तुलना में अधिक छात्र काउंसलिंग प्रक्रिया में भाग ले सकेंगे और उन्हें पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीट पाने का अवसर प्राप्त होगा।

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इन अंकों में कमी के पीछे सरकार का प्रमुख तर्क यह है कि बड़ी संख्या में पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटें प्रत्येक वर्ष खाली रह जाती थीं। लगभग 70,000 सीटें उपलब्ध होने के बावजूद, दो लाख से अधिक छात्रों के परीक्षा में शामिल होने पर भी सभी सीटों पर दाखिला नहीं हो पा रहा था। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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सरकार का मत है कि मेडिकल सीटें सार्वजनिक संसाधनों से तैयार की जाती हैं, इसलिए उन्हें रिक्त छोड़ना संसाधनों की बर्बादी है। इसी कारण से न्यूनतम योग्यता अंकों को घटाया गया, ताकि अधिक से अधिक उम्मीदवार काउंसलिंग में भाग ले सकें, कोई भी सीट खाली न रहे और देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या में वृद्धि हो सके। चिकित्सा शिक्षा में गुणवत्ता बनाए रखने के लिए, आवश्यक पात्रता के मानकों को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। लेटेस्ट एजुकेशन और जॉब अपडेट्स के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/education/। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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