

बिहार पॉलिटिक्स: जब सियासी गलियारों में मिठास घुली, तो विधानसभा का पूरा माहौल ही बदल गया। यह नजारा तब दिखा जब विधायकों ने अपने क्षेत्र की मशहूर मिठाइयों को पहचान दिलाने की मुहिम छेड़ दी।
हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा के बजट सत्र में एक ऐसा दिलचस्प प्रसंग देखने को मिला, जिसने सदन की गंभीरता को कुछ देर के लिए मिठास में बदल दिया। सदन में विभिन्न क्षेत्रों से आए विधायकों ने अपने-अपने इलाकों की प्रसिद्ध मिठाइयों को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) दिलाने की पुरजोर मांग उठाई। इस अनोखी बहस ने न सिर्फ सदन में ठहाके गूंजने पर मजबूर किया, बल्कि सरकार को भी इस दिशा में आगे बढ़ने का भरोसा देना पड़ा।
यह मांग सिर्फ स्वाद की बात नहीं थी, बल्कि स्थानीय पहचान और आर्थिक उत्थान से भी जुड़ी हुई थी। विधायकों का तर्क था कि इन क्षेत्रीय मिठाइयों को अगर GI Tag मिल जाता है, तो इससे उनकी विशिष्टता वैश्विक स्तर पर स्थापित होगी, जिससे स्थानीय कारीगरों और व्यवसायियों को नया आयाम मिलेगा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह पहल एक तरह से ‘स्थानीय को वैश्विक’ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। इस मांग से साफ है कि कैसे ‘Sweet GI Tag’ की पहचान क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है।
बिहार पॉलिटिक्स और क्षेत्रीय मिठाइयों की मांग
विधायकों द्वारा उठाई गई इस मांग में बिहार के हर कोने से मशहूर मिठाइयों के नाम शामिल थे। किसी ने बांका के लाई-लड्डू की बात की तो किसी ने गया के प्रसिद्ध तिलकुट को याद दिलाया। हाजीपुर का अनरसा, सिलाव का खाजा, पटना का मनेर का लड्डू और विक्रम का रसगुल्ला जैसी कई मिठाइयों के नाम सदन में गूंजे। इन मांगों ने बिहार की समृद्ध पाक-कला परंपरा को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया।
सरकार की ओर से इस मामले पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी गई। संबंधित मंत्री ने सदन को आश्वस्त किया कि विधायकों की इन मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा और GI Tag की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। इस आश्वासन से सदन में मौजूद सभी सदस्यों में खुशी की लहर दौड़ गई, और यह बहस एक सुखद अंत की ओर बढ़ती दिखी।
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यह घटना दिखाती है कि कैसे राजनीतिक मंच पर भी आम जनजीवन से जुड़े मुद्दों को संवेदनशीलता से उठाया जा सकता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। GI Tag मिलने से इन मिठाइयों की नकल पर रोक लगेगी और उनकी गुणवत्ता व प्रामाणिकता भी सुनिश्चित होगी। बिहार पॉलिटिक्स में ऐसे मुद्दे अक्सर स्थानीय स्तर पर बड़ी बहस छेड़ देते हैं।
मिठाइयों के GI टैग से लाभ और भविष्य की संभावनाएं
मिठाइयों को जीआई टैग मिलने से न सिर्फ उनकी ब्रांडिंग होगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। यह उन कारीगरों के लिए एक बड़ी राहत होगी जो पीढ़ियों से इन मिठाइयों को बनाने की कला को जीवित रखे हुए हैं। बिहार की संस्कृति और परंपरा में मिठाइयों का विशेष स्थान रहा है, और इस पहल से यह विरासत और भी मजबूत होगी।
विभिन्न राज्यों में कई उत्पादों को पहले ही जीआई टैग मिल चुका है, और अब बिहार भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उम्मीद है कि सरकार की यह पहल जल्द ही रंग लाएगी और बिहार की मशहूर मिठाइयां वैश्विक पटल पर अपनी अलग पहचान बना पाएंगी।



