

Holashtak: होली का पावन पर्व आने से ठीक आठ दिन पहले होलाष्टक प्रारंभ हो जाता है, जो आध्यात्मिक साधना और संयम का समय माना जाता है। भारतीय संस्कृति में हर तिथि और पर्व का अपना विशिष्ट महत्व है, और होलाष्टक भी उन्हीं में से एक है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
Holashtak 2026: होलाष्टक की पौराणिक कथा और इसका आध्यात्मिक महत्व
Holashtak: होली का पावन पर्व आने से ठीक आठ दिन पहले होलाष्टक प्रारंभ हो जाता है, जो आध्यात्मिक साधना और संयम का समय माना जाता है। इस अवधि में शुभ कार्यों को वर्जित बताया गया है, परंतु यह आत्मचिंतन और भगवद्भक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण काल है। भारतीय संस्कृति में हर तिथि और पर्व का अपना विशिष्ट महत्व है, और होलाष्टक भी उन्हीं में से एक है। यह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर पूर्णिमा तिथि, यानी होलिका दहन तक चलता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस दौरान आठ ग्रहों (सूर्य, चंद्रमा, शनि, शुक्र, गुरु, बुध, मंगल और राहु) का प्रभाव तीव्र हो जाता है, जिसके कारण कई शुभ कार्य वर्जित होते हैं। हालांकि, यह समय तपस्या, दान-पुण्य और भगवान की आराधना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें: धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें।
Holashtak के दौरान क्या करें और क्या न करें
होलाष्टक की पौराणिक कथा: भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप
यह मान्यता है कि होलाष्टक की शुरुआत भक्त प्रह्लाद की कथा से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, दैत्यराज हिरण्यकश्यप को भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि वह न दिन में मरे, न रात में, न घर के अंदर, न बाहर, न अस्त्र से, न शस्त्र से, न मनुष्य से, न पशु से। इस वरदान के अहंकार में वह स्वयं को भगवान मानने लगा और अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति से विमुख करने के अनेक प्रयास किए। इन्हीं आठ दिनों में, जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को तरह-तरह की यातनाएँ दीं, जिन्हें प्रह्लाद ने अपनी अटूट भक्ति के बल पर सह लिया। अंततः हिरण्यकश्यप की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। लेकिन भगवान की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद सकुशल बच गए। यही कारण है कि होलाष्टक के इन आठ दिनों को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है, पर यह भक्ति और तपस्या का प्रतीक भी है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
होलाष्टक 2026: शुभ मुहूर्त
होलाष्टक का समय शुभ कार्यों के लिए भले ही वर्जित हो, लेकिन यह आध्यात्मिक उन्नति के लिए विशेष फलदायी होता है।
| तिथि | दिन | मुहूर्त का विवरण |
|---|---|---|
| 06 मार्च 2026 | शुक्रवार | होलाष्टक प्रारंभ (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) |
| 13 मार्च 2026 | शुक्रवार | होलाष्टक समाप्त (होलिका दहन, फाल्गुन पूर्णिमा) |
होलाष्टक के दौरान किए जाने वाले कार्य
- ईश्वर भक्ति और ध्यान में समय व्यतीत करें।
- नियमित रूप से अपने इष्टदेव का स्मरण करें और उनके मंत्रों का जाप करें।
- दान-पुण्य और सेवा कार्य करें, इससे कष्टों में कमी आती है।
- महामृत्युंजय मंत्र का जाप विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
- विभिन्न देवी-देवताओं के हवन और यज्ञ संपन्न किए जा सकते हैं, लेकिन गृह प्रवेश या विवाह जैसे शुभ कार्य वर्जित हैं।
- पुराने विवादों को सुलझाने और मन की शुद्धि के लिए यह उत्तम समय है।
मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।
ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट।
निष्कर्ष और उपाय
होलाष्टक का पर्व हमें यह सिखाता है कि सत्य और भक्ति की शक्ति सबसे बढ़कर है। यह अवधि हमें बाहरी आडंबरों से दूर रहकर आत्मिक शुद्धि और ईश्वर के प्रति समर्पण का मार्ग दिखाती है। इस दौरान आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। संयम रखकर, प्रभु का स्मरण कर और अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण पाकर हम इस काल को अपने जीवन के लिए अत्यंत फलदायी बना सकते हैं। होलिका दहन के साथ ही सभी नकारात्मकताएँ जल जाती हैं और जीवन में नव ऊर्जा का संचार होता है। अतः होलाष्टक को केवल शुभ कार्यों की वर्जना के रूप में न देखकर, इसे आध्यात्मिक जागरण के अवसर के रूप में ग्रहण करना चाहिए।

