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Bhagalpur News: भागलपुर में Holika Dahan… गूंजने लगी ‘बड़कुल्ला’ की परंपरा, जानिए क्यों होलिका दहन से पहले बनाना होता है इसे शुभ… पढ़िए होलिका माता, भक्त प्रह्लाद, ढाल, तलवार और बच्चों के चांद-सूरज

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Holika Dahan: जैसे-जैसे फागुन की हवाओं में रंगों की महक घुलने लगती है, वैसे-वैसे आस्था की पारंपरिक तैयारियां भी जोर पकड़ लेती हैं। भागलपुर के घरों में एक खास परंपरा ने दस्तक दे दी है, जहां गाय के गोबर से बनी कलाकृतियां सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत का जीवंत प्रतीक हैं।

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भागलपुर में होली का उत्सव यूं तो बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है, लेकिन इसकी सबसे अनूठी रस्म होलिका दहन से कुछ दिन पहले जीवंत होती है। शहर के मारवाड़ी घरों में इन दिनों ‘बड़कुल्ला’ बनाने की सदियों पुरानी परंपरा निभाई जा रही है। यह बड़कुल्ले गाय के गोबर से तैयार की जाने वाली छोटी-छोटी कलाकृतियां होती हैं, जिन्हें होलिका दहन के दिन अग्नि को समर्पित किया जाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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Holika Dahan और बड़कुल्लों का क्या है संबंध?

इन बड़कुल्लों को बनाने की एक निश्चित तिथि और नियम होता है। होलिका दहन की तिथि नजदीक आते ही इसे बनाने का काम शुरू हो जाता है। इनमें मुख्य रूप से होलिका माता, भक्त प्रह्लाद, ढाल, तलवार और बच्चों के लिए चांद-सूरज जैसे खिलौनों की आकृतियां बनाई जाती हैं। यह परंपरा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि परिवार को एक साथ जोड़ने का भी एक खूबसूरत माध्यम है।

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क्या है भक्त प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा?

इस परंपरा का सीधा संबंध भक्त प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा से है। शास्त्रों के अनुसार, भक्त प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे, लेकिन उनके राक्षस पिता हिरण्यकश्यप को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने के कई प्रयास किए, लेकिन हर बार वह असफल रहा।

Bhagalpur News: भागलपुर में Holika Dahan... गूंजने लगी 'बड़कुल्ला' की परंपरा, जानिए क्यों होलिका दहन से पहले बनाना होता है इसे शुभ... पढ़िए होलिका माता, भक्त प्रह्लाद, ढाल, तलवार और बच्चों के चांद-सूरज

अंत में, उसने अपनी बहन होलिका की मदद ली, जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका, भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती चिता पर बैठ गई। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से भक्त प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ और वरदान के दुरुपयोग के कारण होलिका स्वयं उस अग्नि में भस्म हो गई। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इसी खुशी और बुराई पर अच्छाई की जीत के उल्लास में यह पर्व मनाया जाता है।

कैसे निभाई जाती है यह अनूठी परंपरा?

मारवाड़ी समाज में इस परंपरा को आज भी पूरी श्रद्धा के साथ जीवित रखा गया है। हर घर में महिलाएं और बच्चे मिलकर गाय के गोबर से बड़कुल्ले बनाते हैं और फिर उन्हें सुखाकर एक माला में पिरोया जाता है। होलिका दहन के दिन, परिवार के सभी सदस्य इस माला को लेकर दहन स्थल तक जाते हैं और विधिवत पूजा-अर्चना के बाद इसे पवित्र अग्नि में समर्पित कर देते हैं।

दहन के बाद बची हुई राख को घर लाया जाता है और अगले दिन जब राख ठंडी हो जाती है, तो उसे एक-दूसरे को लगाकर खुशियां मनाई जाती हैं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/। माना जाता है कि समय के साथ यही परंपरा रंगों और गुलाल की होली में परिवर्तित हो गई। प्रवक्ता चांद झुनझुनवाला ने बताया कि भागलपुर के सोनापट्टी और खलीफाबाग चौक समेत कई प्रमुख स्थानों पर होलिका दहन का आयोजन भव्य रूप से किया जाएगा।

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