
Holi 2026: सनातन धर्म में होली का पर्व प्रेम, सौहार्द और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह पावन पर्व हर साल फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है, जिसके अगले दिन रंगों का उत्सव होता है। होलिका दहन, भक्त प्रह्लाद की कथा और वसंत ऋतु के आगमन से जुड़ा यह महापर्व धार्मिक, सामाजिक और कृषक समाज में भी इसका विशेष महत्व है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
होली 2026: जानिए इस पावन पर्व का महत्व, कथा और शुभ मुहूर्त
होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो देशभर में बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हमें असत्य पर सत्य की जीत, अहंकार पर भक्ति की विजय और प्रकृति में नवजीवन के संचार का संदेश देता है।
होली 2026 पर होलिका दहन का विशेष महत्व
होली का पर्व होलिका दहन से प्रारंभ होता है। इस दिन सूर्यास्त के बाद शुभ मुहूर्त में होलिका प्रज्वलित की जाती है, जो बुराई के नाश का प्रतीक है। होलिका दहन के दिन कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए और पूजन विधि का पालन करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस दिन विशेष पूजा-अर्चना का विधान है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
होलिका दहन की पूजा विधि
होलिका दहन की पूजा विधि अत्यंत सरल और भक्तिपूर्ण है। विधिवत पूजा करने से समस्त नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और घर में सुख-शांति आती है।
* होलिका दहन से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
* लकड़ी और उपलों से बनी होलिका के पास पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
* गणेश जी का स्मरण करें और जल, रोली, चावल, फूल, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे और एक नारियल अर्पित करें।
* होलिका पर पाँच प्रकार के अनाज चढ़ाएँ।
* कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर सात बार लपेटें।
* होलिका पर गोबर से बनी ढाल और अन्य सामग्री भी अर्पित करें।
* पूजन के बाद भगवान नरसिंह का स्मरण करें।
होलिका दहन 2026 शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में होलिका दहन के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार रहेगा:
| विवरण | समय |
| :— | :— |
| होलिका दहन तिथि | 14 मार्च 2026, शनिवार |
| पूर्णिमा तिथि प्रारंभ | 14 मार्च 2026, प्रातः 09:49 बजे |
| पूर्णिमा तिथि समाप्त | 15 मार्च 2026, प्रातः 09:47 बजे |
| होलिका दहन मुहूर्त | 14 मार्च 2026, सायं 06:29 बजे से रात्रि 08:52 बजे तक |
| अवधि | 02 घंटे 23 मिनट |
होलिका दहन की कथा: भक्ति की शक्ति
होली का पर्व मुख्य रूप से भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की पौराणिक कथा से जुड़ा है। असुर राजा हिरण्यकशिपु को भगवान ब्रह्मा से वरदान मिला था कि उसे न कोई मनुष्य मार सकता है और न ही कोई पशु, न दिन में और न रात में, न घर के अंदर और न बाहर, न शस्त्र से और न ही अस्त्र से। इस वरदान के कारण वह स्वयं को अमर मानने लगा और भगवान विष्णु का परम विरोधी बन गया। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया।
लेकिन उसका अपना पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को कई बार मारने का प्रयास किया, परंतु हर बार भगवान विष्णु ने उसे बचा लिया। अंत में, हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को बुलाया, जिसे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका स्वयं जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की याद में होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई और भक्ति की शक्ति की विजय का प्रतीक है।
होलिका दहन का मंत्र
होलिका दहन के समय इस मंत्र का जाप करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है:
अहकूटा भयत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः।
अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम्।।
निष्कर्ष और उपाय
होली का पर्व हमें यह सिखाता है कि सत्य और धर्म का मार्ग ही अंतिम विजय दिलाता है। इस दिन होलिका दहन के बाद राख को घर लाकर माथे पर लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-समृद्धि आती है। अगले दिन रंगों से होली खेलकर आपसी प्रेम और भाईचारे को मजबूत करें। यह पर्व हमें प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन से सभी बुराइयों को त्यागकर एक सकारात्मक और प्रेमपूर्ण जीवन जिएं। होलिका दहन की यह कथा हमें सदैव धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें
The post सदाचार की विजय और भक्ति की शक्ति का प्रतीक पर्व है होली appeared first on Prabhat Khabar.







