
Holi 2026: रंगों का त्योहार जब दहलीज पर दस्तक दे, तो मिथिला की धरती भला कैसे शांत रह सकती है? यहाँ की हवा में सिर्फ अबीर-गुलाल की महक नहीं, बल्कि प्रेम और परंपरा का वह संगीत घुलता है, जो सदियों से दिलों को भिगोता आ रहा है। यह पर्व यहाँ सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन है।
Mithila Holi 2026: परंपरा और संगीत का अनूठा संगम
संपूर्ण भारत में होली का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन मिथिलांचल की होली का अपना एक विशिष्ट और अनूठा रंग है। यहाँ की होली में लोक-संस्कृति की गहरी छाप दिखती है, जहाँ रंगों के साथ-साथ गीतों की बौछार होती है। इस अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक फगुआ गीत माहौल में और भी मिठास घोल देते हैं। दरभंगा के चुनाव आइकॉन, वरिष्ठ पत्रकार, वरिष्ठ कवि और साहित्यकार मणिकांत झा द्वारा रचित ऐसा ही एक गीत मिथिला की होली की पूरी तस्वीर पेश करता है, जिसमें यहाँ के सामाजिक और पारिवारिक संबंधों की गहराई झलकती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मिथिला की आत्मा का प्रतिबिंब है।
मणिकांत झा का यह प्रसिद्ध गीत मिथिला के घर-आंगन में होली के दृश्य को शब्दों में पिरोता है। आइए, इस गीत के बोल पर एक नजर डालें:
भरि मिथिला आजु मचे होरी भरि मिथिला।
किनकाक हाथ कनक पिचकारी
किनका हाथ अबीर झोरी, भरि मिथिला।
पाहुनक हाथ कनक पिचकारी
धिया केर हाथ अबीर झोरी, भरि मिथिला।
किनकर मुखरा दप दप गोरे
किनकर लागनि चकोरी, भरि मिथिला।
पाहुनक मुखरा दप दप गोरे
धिया मोर जेना चकोरी, भरि मिथिला।
सदा आनंद रहे एहि द्वारे
मणिकांत मन विभोरी, भरि मिथिला।
गीत में दामाद और बेटी का खास महत्व
इस गीत की सबसे सुंदर बात यह है कि यह मिथिला के पारिवारिक संबंधों की पवित्रता को दर्शाता है। गीत में जब सवाल उठता है कि सोने की पिचकारी किसके हाथ में है और अबीर की झोली कौन संभाले है, तो जवाब मिलता है- ‘पाहुनक हाथ कनक पिचकारी, धिया केर हाथ अबीर झोरी’। ‘पाहुन’ यानी दामाद को मिथिला में विशेष सम्मान दिया जाता है, और यह गीत उसी परंपरा को होली के रंगों में घोलकर प्रस्तुत करता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। सोने की पिचकारी दामाद के हाथ में देकर उन्हें सर्वोच्च सम्मान दिया गया है।
वहीं, बेटी (‘धिया’) को भी उतना ही स्नेह और महत्व दिया गया है। उसके चेहरे की चमक को चकोर की तरह बताया गया है, जो प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक है। यह दिखाता है कि मिथिला की संस्कृति में रिश्तों की मिठास और सम्मान किस कदर रचा-बसा है। इस तरह के पारंपरिक फगुआ गीत न केवल उत्सव का हिस्सा हैं, बल्कि वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस संस्कृति को हस्तांतरित करने का माध्यम भी हैं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/
गीत के अंत में ‘सदा आनंद रहे एहि द्वारे’ की कामना की गई है, जो मिथिलावासियों की सादगी और सबके लिए मंगलकामना की भावना को प्रकट करता है। मणिकांत झा ने अपने शब्दों से न केवल होली का वर्णन किया है, बल्कि एक पूरे समाज के सांस्कृतिक ताने-बाने को खूबसूरती से प्रस्तुत किया है। यह गीत बताता है कि मिथिला की होली सिर्फ रंग खेलने तक सीमित नहीं, बल्कि यह रिश्तों को सहेजने और परंपराओं को जीने का भी पर्व है।






