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मार्च, 5, 2026
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समय का फेर: राबड़ी का बंगला खाली कराने वाले Nitish Kumar का अब खुद बदलेगा पता, – 1 अणे और 10 सर्कुलर… सुर्खियों में? पढ़िए…फिर से इक बार उजड़ जाते हैं चल, तेरे इश्क़ में पड़ जाते हैं…!

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Nitish Kumar: सियासत की बिसात पर कब कौन सी चाल शह दे दे और कब मात, यह कोई नहीं जानता। कल तक जो सत्ता के शिखर पर थे, आज उनके ही सियासी ठिकाने पर सवालिया निशान लग गया है। बिहार की राजनीति के दो सबसे चर्चित पते- 1 अणे मार्ग और 10 सर्कुलर रोड, एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार कहानी का रुख बदला हुआ है।

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जब Nitish Kumar को ही खाली करना पड़ेगा मुख्यमंत्री आवास

बिहार के सियासी गलियारों से जो खबर छनकर आ रही है, वह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री Nitish Kumar अब राज्यसभा का रुख कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो उन्हें मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास, 1 अणे मार्ग, खाली करना होगा। यह वही आवास है जो बिहार में सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है।

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यह घटनाक्रम इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि कुछ महीने पहले ही वर्तमान सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी बंगला खाली कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। हालांकि, राबड़ी देवी ने अब तक वह बंगला खाली नहीं किया है और अब खुद मुख्यमंत्री के आवास पर ही अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।

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सियासत का चक्र और पते की अदला-बदली

कहते हैं समय का चक्र जब घूमता है तो बड़े-बड़े सूरमाओं को भी आसमान से जमीन पर ला देता है। बिहार की राजनीति (Bihar politics) में इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस मुख्यमंत्री ने पूर्व मुख्यमंत्री का आवास खाली कराने में रुचि दिखाई, अब उन्हें ही अपना आवास छोड़ना पड़ सकता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यह स्थिति न केवल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है, बल्कि आम जनता के बीच भी इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं।

बिहार की जनता ने उन्हें पांच वर्षों के लिए जनादेश दिया था, लेकिन कुछ ही महीनों में सत्ता का समीकरण इस कदर बदला कि अब मुख्यमंत्री की कुर्सी और आवास दोनों पर संशय के बादल मंडरा रहे हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह पूरा प्रकरण बिहार की अस्थिर राजनीतिक स्थिति को भी दर्शाता है, जहां दोस्ती और दुश्मनी की परिभाषाएं हर पल बदलती रहती हैं।

बिहार की सियासी रणभूमि में, भाजपा और जेडीयू का पुराना गठबंधन अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। वर्षों से चला आ रहा यह साथ अब शक्ति संतुलन के एक बड़े बदलाव का गवाह बन रहा है। कभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में ‘बड़े भाई’ की भूमिका में रही जेडीयू अब धीरे-धीरे हाशिए पर धकेली जा रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार अपनी पकड़ मजबूत करते हुए खुद को ‘सीनियर पार्टनर’ के तौर पर स्थापित कर चुकी है। इस बदलते समीकरण में जेडीयू-भाजपा गठबंधन की गतिशीलता भी प्रभावित हुई है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

गठबंधन की बदलती ‘बिहार पॉलिटिक्स’ और जेडीयू का सिकुड़ता आधार

विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ विधानसभा और लोकसभा चुनावों के नतीजों ने जेडीयू के जनाधार को कमजोर किया है, जबकि भाजपा ने बिहार में अपनी पैठ लगातार बढ़ाई है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू को वो सफलता नहीं मिल पा रही है जो पहले मिली थी। इसी वजह से जेडीयू-भाजपा गठबंधन के भीतर भी भाजपा का पलड़ा भारी होता जा रहा है।

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इस राजनीतिक बदलाव का सीधा असर गठबंधन के फैसलों और सीटों के बंटवारे पर भी दिख रहा है। अब भाजपा की शर्तें और रणनीतियाँ अधिक प्रभावी हो रही हैं, जिससे जेडीयू के लिए अपनी पुरानी स्थिति बनाए रखना चुनौती बन गया है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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बिहार में भाजपा का बढ़ता कद और भविष्य की चुनौतियाँ

जानकार बताते हैं कि भाजपा अब राज्य में सबसे मजबूत राजनीतिक दल बनकर उभरी है। यह बदलाव केवल संख्यात्मक नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में उसके रणनीतिक और वैचारिक प्रभाव में भी साफ दिख रहा है। जहां एक ओर भाजपा अपने लक्ष्यों को साधने में सफल रही है, वहीं जेडीयू को अपने अस्तित्व और प्रभाव को बनाए रखने के लिए नई रणनीतियों पर विचार करना होगा। आने वाले चुनावों में इस नए शक्ति संतुलन का सीधा असर देखने को मिल सकता है, जिससे बिहार की राजनीति एक नया अध्याय लिखेगी।

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