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मार्च, 7, 2026
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Nitish Kumar: कभी BJP को नाथते- ‘बिग ब्रदर’ रहे Nitish कैसे हुए कमजोर? पढ़िए …आज के बेबस नीतीश? और JDU की अंदरूनी कलह की पूरी कहानी

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Nitish Kumar: कभी BJP को अंगूठे पर नचाने वाले नीतीश आज क्यों हैं बेबस? JDU की अंदरूनी कलह की पूरी कहानी

Nitish Kumar: सियासत की बिसात पर शह और मात का खेल पुराना है, लेकिन बिहार में तो कभी वजीर रहा चेहरा ही आज अपनी चालों में उलझकर बेबस नजर आ रहा है। लगभग डेढ़ दशक तक भाजपा पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने वाले Nitish Kumar आज उसी भाजपा के सामने राजनीतिक रूप से लाचार दिख रहे हैं। यह स्थिति एक दिन में नहीं बनी, बल्कि इसके पीछे जनता दल यूनाइटेड (JDU) की अंदरूनी कलह और बदलती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की एक लंबी कहानी है।

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जब तक सुशील कुमार मोदी बिहार में भाजपा का चेहरा थे, तब तक नीतीश कुमार को कोई खास खतरा महसूस नहीं हुआ। असली मुश्किलों की शुरुआत 2020 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद हुई, जब नीतीश की पार्टी JDU तीसरे नंबर पर खिसक गई। इसके बाद आरसीपी सिंह की अधीरता ने आग में घी का काम किया। 2021 में, आरसीपी सिंह ने नीतीश कुमार की इच्छा के विरुद्ध और ललन सिंह को नजरअंदाज करते हुए सीधे मोदी-शाह से नजदीकी बढ़ाई और केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। यहीं से JDU के दो सबसे बड़े नेताओं, आरसीपी सिंह और ललन सिंह के बीच टकराव का जन्म हुआ।

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कभी भाजपा के ‘बिग ब्रदर’ रहे Nitish Kumar कैसे हुए कमजोर?

आरसीपी सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के नीतीश कुमार के फैसले से ललन सिंह पहले से ही असहज थे। ललन सिंह, नीतीश के साथ संघर्ष के दिनों से थे, जबकि आरसीपी सिंह की एंट्री राजनीति में काफी बाद में हुई थी। जब आरसीपी को दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा गया और पार्टी से बाहर कर दिया गया, तो ललन सिंह का कद बढ़ गया। कहा जाता है कि आहत ललन सिंह ने न सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला, बल्कि नीतीश कुमार को भाजपा से अलग कर RJD-कांग्रेस के साथ महागठबंधन में ले जाने में भी अहम भूमिका निभाई। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उस दौरान तत्कालीन विधानसभा स्पीकर विजय कुमार सिन्हा पर नीतीश कुमार का गुस्सा भी ललन सिंह के प्रभाव का ही नतीजा माना जाता है।

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यह भी पढ़ें:  Nitish Kumar Rajya Sabha: बिहार में बगावत! नीतीश के राज्यसभा जाने की अटकलों पर JDU में बवाल, कार्यकर्ताओं ने पोती PM मोदी के पोस्टर पर कालिख

हालांकि, बिहार की राजनीति में समीकरण हमेशा बदलते रहते हैं। अक्टूबर 2023 आते-आते खेल फिर पलटने लगा। नीतीश कुमार ने न सिर्फ ललन सिंह से अध्यक्ष पद वापस ले लिया, बल्कि 2024 की शुरुआत में वे वापस भाजपा के पाले में चले गए। इस पूरी पटकथा के पीछे कई और चेहरे भी थे, जिन्होंने JDU की आंतरिक राजनीति को प्रभावित किया।

अशोक चौधरी की ‘भीम संसद’ से कैसे बदला JDU का समीकरण?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि 26 नवंबर 2023 को पटना में हुई ‘भीम संसद’ ने JDU के अंदर एक नई हलचल पैदा कर दी। नीतीश कैबिनेट के मंत्री अशोक चौधरी के बढ़ते कद और उनकी महत्वाकांक्षाओं ने ललन सिंह के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। दूसरी तरफ, संजय झा पर्दे के पीछे से नीतीश कुमार को लगातार भाजपा के करीब लाने की कोशिशों में जुटे थे और अंततः वे इसमें सफल भी रहे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस पूरे खेल में नीतीश कुमार एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस गए, जहां से निकलना उनके लिए मुश्किल हो गया।

आज स्थिति यह है कि भाजपा के पास अधिक विधायक होने के बावजूद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह 2024 के लोकसभा और 2025 के विधानसभा चुनाव हैं। भाजपा जानती है कि नीतीश कुमार का वोट बैंक इन चुनावों में जीत के लिए जरूरी है, इसीलिए फिलहाल उन्हें मुख्यमंत्री बनाए रखा गया है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। वर्तमान विधानसभा के जो समीकरण हैं, उसमें अब फिर से पाला बदलना यानी ‘पलटासन’ का फॉर्मूला भी कारगर नहीं दिखता। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। ऐसे में नीतीश कुमार के लिए आगे की राह चुनौतियों से भरी है।

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