स्कूल के बाहर उचक्के, शहर के लिए नई बात नहीं है। छुट्टी का समय होते ही पान की दुकान, कोल्ड ड्रिक का स्टॉल, स्कूल गेट के बाहर भीड़ की शक्ल में ये उचक्के परेशानी का सबब बन रहे। पुलिस को पता है, प्रशासन को जानकारी है लेकिन हकीकत यही है ऐसे उचक्कों की पूरी सत्ता इन अफसरों पर भारी है। यही वजह है एक कविता याद आती है जो इस शहर को नसीब नहीं, उनमें आदमियों का नहीं, एक जंगल का बचपन है, जंगल जो हरियाली से काट दिए गए हैं, और अब सिर्फ आग ही हो सकते हैं, नहीं बच्चे फूल नहीं होते
फूल स्कूल नहीं जाते, स्कूल जलते हुए जंगल नहीं होते।
- Advertisement -



You must be logged in to post a comment.