
Rang Panchami: आस्था और रंगों का ऐसा संगम कि देवता भी धरती पर उतरने को विवश हो जाएं। जाले के ब्रह्मपुर स्थित गौतम कुंड में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां रंग पंचमी का पर्व बड़े ही धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर, हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने पौराणिक गौतम कुंड में आस्था की डुबकी लगाई और भक्ति के रंग में सराबोर हो गए।
गौतम कुंड में आस्था का सैलाब, जानिए क्यों खास है देवताओं की Rang Panchami और इसका महत्व
जाले प्रखंड के ब्रह्मपुर पश्चिमी पंचायत में स्थित पौराणिक एवं धार्मिक महत्व वाले गौतम कुंड में मंगलवार को रंग पंचमी का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस मौके पर दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जिन्होंने कुंड में पवित्र स्नान कर पुण्य अर्जित किया। स्नान के बाद, सभी श्रद्धालु राम पंचायतन मंदिर में चल रहे भजन-कीर्तन और होली के पारंपरिक गीतों में शामिल हुए। इस आयोजन में पुरुषों की अपेक्षा महिला श्रद्धालुओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
क्यों मनाई जाती है Rang Panchami?
गौतम कुंड न्यास समिति के अध्यक्ष डॉ. विजय भारद्वाज ने इस पर्व के पौराणिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि ब्रज भूमि में भगवान श्रीकृष्ण को राधारानी के साथ होली खेलते देख, स्वर्ग में बैठे देवताओं में भी भूलोक पर आकर रंग खेलने की इच्छा जाग्रत हुई। इसके बाद देवताओं ने पंचमी तिथि को पृथ्वी पर आकर रंगोत्सव मनाने का निर्णय लिया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि इस दिन देवता स्वयं पृथ्वी पर आकर रंग खेलते हैं, इसीलिए इसे देव पंचमी भी कहा जाता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/
गौतम कुंड में दिखा अटूट विश्वास
इस अवसर पर गौतम कुंड परिसर में भक्ति और उल्लास का माहौल चरम पर था। सुबह से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था। कुंड में स्नान करने के बाद लोगों ने मंदिर में पूजा-अर्चना की और एक-दूसरे को गुलाल लगाकर पर्व की शुभकामनाएं दीं। पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया था और हर तरफ से भजनों की मधुर ध्वनि आ रही थी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। गौतमाश्रम पहुंचने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए न्यास समिति की ओर से प्रसाद के रूप में एक विशाल भंडारे का भी आयोजन किया गया, जहां सभी ने एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। यह आयोजन क्षेत्र में आपसी सौहार्द और धार्मिक आस्था का प्रतीक बन गया है।




