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मार्च, 9, 2026
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भारत में भारतीय रुपया: डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट और आर्थिक प्रभाव

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Indian Rupee: वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गया है। हफ्ते के पहले कारोबारी दिन ही रुपये में बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जिससे आयात बिल बढ़ने और महंगाई पर दबाव की चिंताएँ बढ़ गई हैं।

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भारत में भारतीय रुपया: डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट और आर्थिक प्रभाव

भारतीय रुपया क्यों हुआ कमजोर?

वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गया है। हफ्ते के पहले कारोबारी दिन ही रुपये में बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जिससे आयात बिल बढ़ने और महंगाई पर दबाव की चिंताएँ बढ़ गई हैं। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 46 पैसे टूटकर 92.28 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच गया। दिन की शुरुआत 92.22 प्रति डॉलर पर हुई थी, लेकिन जल्द ही यह 92.28 प्रति डॉलर तक गिर गया, जो पिछले बंद स्तर से एक बड़ी गिरावट है। इससे पहले 4 मार्च को भी रुपये ने 92.35 प्रति डॉलर का अब तक का सबसे निचला इंट्रा-डे स्तर छुआ था।

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विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने Crude Oil की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड वायदा कारोबार में 25.68 प्रतिशत उछलकर 116.5 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया। यह स्थिति भारत जैसी बड़ी तेल आयातक अर्थव्यवस्थाओं की मुद्रा पर सीधा दबाव डालती है। फिन्रेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली ने भी पुष्टि की है कि तेल की कीमतों में यह उछाल रुपये पर लगातार दबाव बनाए रखेगा।

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यह भी पढ़ें:  स्टॉक मार्केट में भू-राजनीतिक उथल-पुथल: निवेशकों के 12 लाख करोड़ डूबे

केवल भारत ही नहीं, बल्कि एशिया की अन्य प्रमुख मुद्राएं भी सोमवार को कमजोर रहीं। कारोबारियों का अनुमान है कि यदि आने वाले कारोबारी सत्रों में Crude Oil की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है, तो रुपया 93 प्रति डॉलर के स्तर तक भी गिर सकता है। इस बीच, छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला यूएस डॉलर इंडेक्स भी 0.66 प्रतिशत बढ़कर 99.64 पर पहुँच गया है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह वैश्विक बाजार में डॉलर की बढ़ती मांग को दर्शाता है।

घरेलू शेयर बाजार में भी इस गिरावट का व्यापक असर देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 2,345.89 अंक गिरकर 76,573.01 पर आ गया, जबकि निफ्टी 50 भी 708.75 अंक टूटकर 23,741.70 पर पहुँच गया। शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने शुक्रवार को शुद्ध रूप से 6,030.38 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे, जो बाजार में अनिश्चितता का स्पष्ट संकेत है।

भारत पर कमजोर रुपये का व्यापक प्रभाव

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। ऐसे में वैश्विक ऊर्जा कीमतों में किसी भी बदलाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत का आयात बिल स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। चूंकि तेल का भुगतान डॉलर में होता है, रुपये के कमजोर होने पर भारत को तेल खरीदने के लिए अधिक स्थानीय मुद्रा खर्च करनी पड़ती है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव बनता है। इसके अतिरिक्त, तेल महंगा होने से देश का राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है और महंगाई पर दबाव तीव्र होता है, जिसका सीधा बोझ आम उपभोक्ता पर पड़ता है।

कमजोर रुपये और वैश्विक अनिश्चितता का असर निवेशकों के भरोसे पर भी पड़ता है। ऐसे दौर में निवेशक अक्सर शेयर बाजार जैसे जोखिम भरे निवेशों से पैसा निकालकर सोना और चांदी जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। हालांकि, कमजोर रुपये का कुछ विशेष क्षेत्रों को अप्रत्याशित लाभ भी मिलता है। आईटी, फार्मा और टेक्सटाइल जैसे निर्यात-उन्मुख सेक्टर की कंपनियों की कमाई डॉलर में होती है, इसलिए रुपये के कमजोर होने से उनकी आय में स्वाभाविक रूप से बढ़ोतरी हो सकती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1, जो आपको ऐसे ही सटीक विश्लेषण देता है। रियल-टाइम बिजनेस – टेक्नोलॉजी खबरों के लिए यहां क्लिक करें https://deshajtimes.com/news/business/

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