
Sonam Wangchuk Education: लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एक बार फिर सुर्खियों में हैं। हाल ही में उन्हें हिरासत से रिहा किए जाने की खबर सामने आने के बाद लोग उनके जीवन और विशेषकर उनकी शिक्षा यात्रा के बारे में जानने को उत्सुक हैं। सोनम वांगचुक सिर्फ एक इंजीनियर ही नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा और नवाचार के जरिए समाज में बड़ा बदलाव लाने का प्रयास किया।
सोनम वांगचुक एजुकेशन: 9 साल की उम्र तक स्कूल न जाने वाले इस शख्स ने कैसे बदली शिक्षा की तस्वीर?
सोनम वांगचुक एजुकेशन: कैसे की अपनी पढ़ाई पूरी?
लद्दाख के पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गांव में जन्मे वांगचुक के पास उस समय पढ़ाई की सुविधाएं बहुत सीमित थीं। लेकिन कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आगे चलकर एक सफल इंजीनियर बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में सुधार किया और कई ऐसे प्रयोग किए जिनकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होती है। तो आइए जानते हैं कि सोनम वांगचुक ने अपनी पढ़ाई कैसे पूरी की।
सोनम वांगचुक की औपचारिक पढ़ाई मैकेनिकल इंजीनियरिंग तक हुई है। उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी श्रीनगर (NIT श्रीनगर) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री (B.E.) हासिल की है। सोनम वांगचुक अपने गांव में पढ़ाई की सुविधा न होने की वजह से लगभग 9 साल की उम्र तक स्कूल नहीं जा पाए थे। बाद में उन्हें पढ़ाई के लिए श्रीनगर भेजा गया, शुरुआत में उन्हें हिंदी और अंग्रेजी समझने में दिक्कत होती थी, लेकिन उन्होंने अथक मेहनत करके अपनी पढ़ाई जारी रखी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्च भी चलाया।
इंजीनियर बनने के बाद उन्होंने नौकरी के बजाय शिक्षा और समाज सुधार का रास्ता चुना। साल 1988 में, उन्होंने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की स्थापना की, जिसने लद्दाख के छात्रों की शिक्षा व्यवस्था सुधारने का काम शुरू किया। साथ ही उन्होंने पानी की समस्या से निपटने के लिए आइस स्तूप (Ice Stupa) जैसी अनोखी तकनीक भी विकसित की, जिससे उन्हें दुनिया भर में पहचान मिली।
सोनम वांगचुक: बचपन और प्रारंभिक जीवन का संघर्ष
सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के उलेटोकपो नाम के गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम सोनम वांग्याल और मां का नाम शेरिंग है। उस समय उनके गांव में स्कूल जैसी सुविधाएं बहुत सीमित थीं। इसी वजह से वे लगभग 9 साल की उम्र तक औपचारिक शिक्षा से दूर रहे। बाद में पढ़ाई के लिए उन्हें श्रीनगर भेजा गया। वहां भी शुरुआत में उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाएं अच्छी तरह नहीं आती थीं, इसलिए पढ़ाई समझना उनके लिए आसान नहीं था। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे मेहनत करके इन चुनौतियों को पार किया और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर शिक्षा के क्षेत्र में नए इनोवेशन किए।
सोनम वांगचुक को सबसे ज्यादा पहचान उनके अनोखे प्रयोगों और इनोवेशन के कारण मिली। उनका सबसे प्रसिद्ध आविष्कार आइस स्तूप तकनीक है। यह बर्फ से बना कृत्रिम ग्लेशियर होता है, जिससे सर्दियों में पानी जमा किया जाता है और गर्मियों में किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिल जाता है। इस तकनीक की वजह से लद्दाख के कई इलाकों में खेती करना आसान हुआ और सूखे जैसी समस्या से काफी हद तक राहत मिली।
सोनम वांगचुक का जीवन यह दिखाता है कि लगन और सही सोच से किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है। उनकी कहानी छात्रों और नौकरी के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है कि कैसे अभावों के बावजूद भी अपने लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है और समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। लेटेस्ट एजुकेशन और जॉब अपडेट्स के लिए यहां क्लिक करें: लेटेस्ट एजुकेशन और जॉब अपडेट्स के लिए यहां क्लिक करें।




