
Jamat ul Vida: जैसे कोई मेहमान अपनी पूरी रौनक बिखेर कर विदा लेता है, ठीक वैसे ही बरकतों और रहमतों का महीना अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। रमजान माह के अंतिम शुक्रवार, यानी विदाई जुम्मा के अवसर पर जाले प्रखंड क्षेत्र की विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने विशेष नमाज अदा की और देश की खुशहाली के लिए हाथ उठाए।
Jamat ul Vida पर मांगी गई अमन-चैन की दुआ
प्रखंड क्षेत्र के गांवों की मस्जिदों में शुक्रवार को नमाजियों की भारी भीड़ देखने को मिली। लोगों ने एक साथ कतार में खड़े होकर नमाज अदा की और मुल्क में अमन-चैन, शांति और उज्ज्वल भविष्य की कामना की। नमाज की समाप्ति के बाद, सभी ने एक-दूसरे से गले मिलकर मुबारकबाद दी और एक-दूसरे के अच्छे स्वास्थ्य व लंबी उम्र के लिए दुआएं कीं। यह नजारा भाईचारे और सौहार्द की मिसाल पेश कर रहा था, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। माहौल पूरी तरह से भक्तिमय बना हुआ था और हर चेहरे पर इबादत का नूर झलक रहा था।
इस मौके पर युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक, सभी में एक अलग ही उत्साह देखने को मिला। लोगों का मानना है कि रमजान के इस आखिरी जुम्मे पर की गई दुआएं अल्लाह जरूर कबूल करता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
क्या है अलविदा जुम्मा का महत्व?
इस संबंध में जानकारी देते हुए देवरा बंधौली के निवासी रेयाज हुसैन सल्फी ने बताया कि हदीस में विदाई जुम्मा को विशेष रूप से मनाने का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन यह एक परंपरा के रूप में वर्षों से मनाया जा रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पाक रमजान के महीने में सच्चे दिल से की गई इबादत ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है, खासकर माह के अंतिम दस दिनों की इबादत का विशेष सवाब (पुण्य) मिलता है।
उन्होंने आगे कहा कि रोजे का मूल उद्देश्य केवल भूखे-प्यासे रहना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि करना, अल्लाह का भय मन में रखना, अपनी पिछली गलतियों के लिए माफी मांगना और भविष्य में गुनाहों से बचने का दृढ़ संकल्प लेना है। यह महीना इंसान को अनुशासन और आत्म-नियंत्रण सिखाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।






