
Gangaur Puja: सोलह श्रृंगार, माथे पर बिंदिया और हाथों में पूजा की थाल लिए सुहागिनों के चेहरे पर आस्था की ऐसी चमक, मानो आसमान से साक्षात शिव-पार्वती का आशीर्वाद बरस रहा हो। भागलपुर में 17 दिनों तक चले इस महापर्व का आज धूमधाम से समापन हो गया।
Gangaur Puja: सुहाग की अमरता और मनचाहे वर का वरदान, भागलपुर में 17 दिनों तक चला गणगौर का महापर्व, धूमधाम से हुआ समापन
क्यों खास है Gangaur Puja और क्या है इसका महत्व?
भागलपुर के ऐतिहासिक श्री रानी सती दादी मंदिर, चुनिहारी टोला में चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। सुबह 6 बजे से लेकर शाम 4 बजे तक, करीब 350 से अधिक महिलाओं ने सोलह श्रृंगार कर और मेहंदी रचाकर गणगौर माता यानी माता पार्वती और भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की। यह पूजा होली के दिन से शुरू होकर पूरे 17 दिनों तक चलती है, जिसमें महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। वहीं कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए यह व्रत रखती हैं।
मंदिर के व्यवस्थापक चांद झुनझुनवाला ने बताया कि वे पिछले 15 वर्षों से इस भव्य आयोजन की व्यवस्था कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि एक समय था जब भागलपुर में यह पूजा घर-घर में होती थी, लेकिन धीरे-धीरे इसका चलन कम होने लगा। हिंदू संस्कृति और समाज की इस अनमोल प्रथा को जीवित रखने के उद्देश्य से उन्होंने मंदिर में सामूहिक पूजन की यह परंपरा शुरू की ताकि किसी भी महिला को अंतिम दिन पूजन के लिए गणगौर प्रतिमा की कमी न हो। जिन कन्याओं का विवाह के बाद पहली होली होती है, उनके लिए यह पूजा अनिवार्य मानी जाती है।
“गोरे गणगौर माता खोल किवाड़ी”… गीतों में गूंजती पौराणिक कथा
पूजा के दौरान “गोरे गणगौर माता खोल किवाड़ी” जैसे पारंपरिक गीत गूंजते रहे। पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या और पूजन किया था। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि जो भी कुंवारी कन्या या सुहागिन इस दिन उनकी पूजा करेगी, उसे उत्तम पति मिलेगा और उसका सुहाग सदा अमर रहेगा। माना जाता है कि राजस्थान की कर्मा बाई ने करीब 300 वर्ष पहले इस पूजा को शुरू किया था, जो धीरे-धीरे पूरे भारत में मारवाड़ी समाज के साथ-साथ अन्य समुदायों में भी फैल गई।
भागलपुर में यह परंपरा लगभग 250 वर्षों से चली आ रही है और अकेले रानी सती मंदिर में पिछले डेढ़ सौ वर्षों से इसका आयोजन हो रहा है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। दादी मंदिर के अलावा, शहर के लाहरी टोला, मारवाड़ी टोला लेन और द्वारिकापुरी कॉलोनी जैसे इलाकों में भी कुछ घरों में यह पूजन किया गया। पूजन के बाद प्रतिमाओं का गंगा नदी में विसर्जन किया गया। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। मंदिर में इस दौरान चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन की पूजा और दुर्गा सप्तशती का पाठ भी जारी रहा।
50 वर्षों से कर रहीं पूजा, बोलीं- “माता ने हर मनोकामना पूरी की”
पूजा करने आई महिलाओं ने अपने अनुभव भी साझा किए। मारवाड़ी टोला की सीमा गोयनका ने बताया कि विवाह से पहले उन्होंने अच्छे पति के लिए गणगौर पूजा की थी और माता ने उनकी मुराद पूरी की। उन्होंने कहा, “जब से गणगौर कर रही हूं, जीवन में सुख-शांति और समृद्धि है। हालांकि विसर्जन के दिन मन दुखी हो जाता है क्योंकि 17 दिनों में प्रतिमा से मोह हो जाता है, लेकिन सृजन और विसर्जन ही प्रकृति का नियम है।”
वहीं, लहरी टोला की संतोषी देवी पिछले 50 वर्षों से यह पूजा कर रही हैं। उन्होंने बताया कि पूरे साल उन्हें इस पर्व का इंतजार रहता है और इस पूजा से मन को असीम शांति मिलती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। मुक्ता देवी और पार्वती देवी ने भी बताया कि वे पूरे विधि-विधान और व्रत के साथ यह पूजा करती हैं, जिससे भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद उनके परिवार पर हमेशा बना रहता है।






