
Political Party Donations: चुनावी समर में जहाँ नेता वोटों के लिए संघर्ष करते हैं, वहीं उनकी पार्टियों के खजाने भी अथाह धन से भर रहे हैं। यह सिर्फ जीत-हार का खेल नहीं, बल्कि धनबल की दौड़ भी है, जो चुनावी लोकतंत्र की नींव को और मजबूत करती है या कमजोर? एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक ताजा रिपोर्ट ने भारतीय राजनीति में बड़े आर्थिक बदलावों की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय दलों को मिलने वाले चंदे में पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 2024-25 में 161 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सबसे अधिक चंदा मिला है, जो अन्य सभी राष्ट्रीय दलों को मिले कुल चंदे से दस गुना से भी अधिक है।
गुरुवार को जारी इस विस्तृत रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2025 में राष्ट्रीय दलों द्वारा घोषित 20,000 रुपये से अधिक के कुल चंदे 11,343 प्राप्तियों से 6,648.563 करोड़ रुपये रहे। इनमें से भाजपा को अकेले 5,522 चंदे के माध्यम से 6,074.015 करोड़ रुपये की राशि प्राप्त हुई है। इसकी तुलना में, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को 2,501 चंदे से 517.394 करोड़ रुपये मिले हैं। ये आंकड़े राजनीतिक दलों की वित्तीय स्थिति में एक बड़े अंतर को दर्शाते हैं। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब चुनावी खर्च और उसकी पारदर्शिता पर लगातार बहस जारी है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
एडीआर की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि भाजपा द्वारा घोषित चंदा कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया-मार्क्सिस्ट (सीपीआई-एम) और नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीईपी) के उसी अवधि के कुल चंदे से दस गुना से भी अधिक था। दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने घोषणा की है कि उसे पिछले 19 वर्षों की तरह इस बार भी 20,000 रुपये से अधिक का कोई चंदा नहीं मिला है, जो उनकी ‘छोटे दान’ की नीति को दर्शाता है।
चंदे में भारी वृद्धि: आंकड़े क्या कहते हैं?
राष्ट्रीय दलों को मिलने वाले कुल चंदे में 2023-24 की तुलना में 2024-25 में 4,104.285 करोड़ रुपये की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अकेले भाजपा के चंदे में पिछले वित्त वर्ष के 2,243.947 करोड़ रुपये से 171 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो पार्टी की बढ़ती वित्तीय शक्ति को उजागर करता है। कांग्रेस को मिलने वाले चंदे में भी 84 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो 2023-24 के 281.48 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 517.394 करोड़ रुपये हो गया। यह वृद्धि सभी प्रमुख दलों में देखी गई है, लेकिन भाजपा की रफ्तार सबसे तेज है।
राजनीतिक दलों को मिले चंदे में कॉरपोरेट फंडिंग का दबदबा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 3,244 चंदे के माध्यम से कुल चंदे का 92.18 प्रतिशत यानी 6128.787 करोड़ रुपये कॉरपोरेट क्षेत्र से आया है। व्यक्तिगत दानदाताओं ने 7,900 चंदे के माध्यम से 505.66 करोड़ रुपये का योगदान दिया, जो कुल चंदे का 7.61 प्रतिशत था। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत में राजनीतिक दलों के लिए कंपनियों से मिलने वाला पैसा कितना महत्वपूर्ण है। भाजपा को 2,794 कॉरपोरेट चंदों से 5,717.167 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जो अन्य सभी राष्ट्रीय दलों द्वारा प्राप्त कुल चंदे (411.62 करोड़ रुपये) से 13 गुना से भी अधिक है। इसे 2,627 अन्य संगठनों से 345.94 करोड़ रुपये का चंदा भी मिला। यह वित्तीय श्रेष्ठता भारतीय राजनीति में भाजपा की मजबूत स्थिति को और पुख्ता करती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
चुनावी ट्रस्टों का योगदान और पारदर्शिता के सवाल
शीर्ष दानदाताओं में, प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट ने भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को मिलाकर कुल 2413.465 करोड़ रुपये का दान दिया। यह दिखाता है कि कैसे चुनावी ट्रस्ट राजनीतिक दलों के लिए एक महत्वपूर्ण कॉरपोरेट फंडिंग का स्रोत बन गए हैं। इसमें से 2180.7119 करोड़ रुपये भाजपा को (पार्टी को प्राप्त कुल धनराशि का 35.90 प्रतिशत), 216.335 करोड़ रुपये कांग्रेस को (पार्टी को प्राप्त कुल धनराशि का 41.81 प्रतिशत) और 16.4178 करोड़ रुपये आम आदमी पार्टी को (पार्टी को प्राप्त कुल धनराशि का 43.08 प्रतिशत) मिले। प्रगतिशील चुनावी ट्रस्ट ने दो दान के माध्यम से 834.97 करोड़ रुपये का दान दिया, जिनमें से एक दान एबी जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट का था। यह सब धनबल की राजनीति में पारदर्शिता और जवाबदेही के सवालों को जन्म देता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।




