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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बहू के Daughter-in-law’s Maintenance पर अहम फैसला: क्या नैतिक फर्ज अब कानून की डोर से बंधेगा?

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Daughter-in-law’s Maintenance: जीवन के पतझड़ में जब सहारे की आस टूटती है और अपनों से ही उम्मीदें परवान नहीं चढ़तीं, तब अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। लेकिन क्या हर नैतिक जिम्मेदारी कानूनी दायरे में आती है? इसी सवाल का जवाब दिया है इलाहाबाद हाईकोर्ट ने, एक ऐसे मामले में जिसने समाज में बुजुर्गों के भरण-पोषण और बहू के कर्तव्य पर एक नई बहस छेड़ दी है।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बहू के Daughter-in-law’s Maintenance पर अहम फैसला: क्या नैतिक फर्ज अब कानून की डोर से बंधेगा?

बहू के Daughter-in-law’s Maintenance पर कोर्ट की दो टूक: नैतिक बनाम कानूनी दायित्व

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल नैतिक जिम्मेदारी को कानूनी तौर पर लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक वृद्ध दंपति की याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने अपने दिवंगत बेटे की पत्नी, यानी अपनी बहू से गुजारा भत्ता दिलाने की मांग की थी। यह फैसला समाज में रिश्तों और कानूनी बाध्यताओं के बीच की बारीक रेखा को उजागर करता है।

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मामले की पूरी कहानी

यह मामला एक ऐसे बुजुर्ग दंपति से जुड़ा है, जिनका बेटा उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत था। दुर्भाग्यवश, वर्ष 2021 में उनका बेटा चल बसा। दंपति ने अदालत में यह दलील दी कि वे अशिक्षित हैं और अपने बेटे पर पूरी तरह निर्भर थे। बेटे के निधन के बाद, उनकी बहू, जो स्वयं भी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है, उसे नौकरी से संबंधित सभी वित्तीय लाभ प्राप्त हुए हैं। बुजुर्ग माता-पिता का तर्क था कि बहू की पर्याप्त आय को देखते हुए, यह उसका नैतिक कर्तव्य है कि वह अपने सास-ससुर का भरण-पोषण करे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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नैतिक कर्तव्य और कानूनी बाध्यता में अंतर

न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने 4 फरवरी को इस मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि समाज में बहू का अपने सास-ससुर की सेवा करना बेशक एक नैतिक जिम्मेदारी मानी जा सकती है, लेकिन भारतीय कानून में इसके लिए कोई अनिवार्य प्रावधान मौजूद नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक किसी कानून में स्पष्ट रूप से लिखित आदेश न हो, तब तक किसी भी नैतिक भावना को कानूनी रूप से थोपा नहीं जा सकता। यह फैसला कानूनी दायित्व और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच के अंतर को रेखांकित करता है।

सीआरपीसी की धारा 125 का दायरा

बुजुर्ग दंपति ने ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ की धारा 125 (जिसे पहले धारा 144 कहा गया था) के तहत राहत की मांग की थी। कोर्ट ने इस धारा का विश्लेषण करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यह धारा केवल पत्नी, बच्चों और माता-पिता को ही गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार प्रदान करती है। कानून बनाने वालों ने सोच-समझकर ‘सास-ससुर’ को इस सूची से बाहर रखा है। इसलिए, इस कानून के प्रावधानों के तहत बहू को अपने सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए आदेश नहीं दिया जा सकता। यह एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या है जो धारा 125 के दायरे को स्पष्ट करती है और बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण का कानूनी दायित्व न होने की पुष्टि करती है।

उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय

हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए फैसले को सही ठहराते हुए बुजुर्गों की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने अवलोकन में यह भी बताया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि बहू को यह नौकरी ‘अनुकंपा’ के आधार पर (बेटे के स्थान पर) प्राप्त हुई थी। कोर्ट ने अपने फैसले को दोहराते हुए कहा कि गुजारा भत्ता केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वारा मांगा जा सकता है जो कानून द्वारा निर्धारित विशेष श्रेणियों में आते हैं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/ आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह निर्णय एक बार फिर इस बात पर मुहर लगाता है कि कानूनी प्रावधान ही सर्वोपरि होते हैं, और केवल नैतिक आधार पर किसी को वित्तीय जिम्मेदारी के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

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