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बिहार शराबबंदी के 10 साल: नीतीश का ‘सुधार’ बना 40,000 करोड़ का ‘भ्रष्टाचार’!

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बिहार शराबबंदी: कल इस कानून को लागू हुए पूरे 10 साल हो गए। लेकिन, क्या नीतीश कुमार का यह महत्वाकांक्षी कदम बिहार को वास्तव में ‘नशामुक्त’ बना पाया या फिर सिर्फ एक विशाल समानांतर अर्थव्यवस्था और संस्थागत भ्रष्टाचार का नया अध्याय लिख गया? आंकड़े और जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यह कानून शासन-प्रशासन और शराब माफिया के नापाक गठजोड़ की बदौलत अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में बुरी तरह विफल रहा है। कई विश्लेषक इसे नीतीश कुमार का सबसे बड़ा संस्थागत भ्रष्टाचार करार दे रहे हैं, जिसके कारण बिहार में 40 हजार करोड़ रुपये की अवैध समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है। शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन की देखरेख करने वाले गृह और मद्य निषेध विभाग भी अधिकांश समय उन्हीं के पास रहे हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।

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क्या कहती है बिहार शराबबंदी की जमीनी हकीकत?

शराबबंदी लागू होने के बाद से बिहार में कानून व्यवस्था से जुड़े कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं:

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  • अब तक 11 लाख से अधिक केस दर्ज किए गए हैं।
  • 16 लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
  • 5 करोड़ लीटर से अधिक शराब बरामद की गई है।
  • विगत 5 साल में 2 करोड़ लीटर से अधिक शराब जब्त की गई, जो प्रतिदिन औसतन 11 हजार लीटर से अधिक है।
  • हालिया आंकड़ों के अनुसार, प्रतिमाह औसतन 3 लाख 70 हजार 684 लीटर अवैध शराब बरामद की गई, यानी प्रतिदिन 12,356 लीटर से अधिक।
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यह तो केवल सरकारी आंकड़ों में जब्त की गई शराब है, लेकिन जमीनी सच्चाई के अनुसार बिहार में प्रतिदिन लगभग 17 लाख लीटर शराब की खपत होती है। बिहार सरकार के मुताबिक, हाल के समय में शराब बरामदगी में 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो यह दर्शाता है कि शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब कारोबार फल-फूल रहा है। अवैध शराब के अलावा, इस कानून की विफलता के कारण बिहार में गांजा, ब्राउन शुगर और अन्य नशीली सामग्रियों का कारोबार भी 40 फीसदी बढ़ गया है। युवा वर्ग बड़े पैमाने पर नशे की गिरफ्त में आ रहा है। यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है कि जब शराबबंदी है, तो इतनी बड़ी मात्रा में शराब और अन्य नशीले पदार्थ बिहार की सीमा में कैसे और किसके सहयोग से आ रहे हैं? सरकार को जब्त नहीं, बल्कि खपत के आंकड़े भी सार्वजनिक करने चाहिए।

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शराबबंदी का कड़वा सच: गरीब निशाना, अफसर मालामाल

बिहार में शराबबंदी कानून अब एक मजाक बनकर रह गया है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा गरीब, दलित, पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। 16 लाख से अधिक गिरफ्तारियों में सबसे अधिक इन्हीं वर्गों के लोग शामिल हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मामले में कड़ी टिप्पणी की है, उनका कहना है कि पुलिस की मिलीभगत के कारण ही शराब की तस्करी हो रही है और पुलिस का एकमात्र काम भ्रष्टाचार, उगाही और कानून का दुरुपयोग करने वालों को संरक्षण देना रह गया है। हैरत की बात यह है कि लाखों लोगों की गिरफ्तारी के बावजूद न तो बड़े सप्लायर और तस्कर पकड़े गए, न ही किसी जिले के एसपी, डीएसपी या बड़े अधिकारी पर कोई कार्रवाई की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने तो यहां तक कहा कि सरकार जिसे चाहती है, उसी पर कार्रवाई करती है, यह चयनात्मक कार्रवाई है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। सरकार उन अधिकारियों और प्रशासनिक लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं करती, जो भ्रष्टाचार के माध्यम से शराबबंदी को विफल कर रहे हैं?

नीतीश कुमार के दोहरे मापदंड: दुकानों की संख्या और शराबबंदी

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि 2004-05 में पूरे बिहार के ग्रामीण इलाकों में 500 से भी कम शराब की दुकानें थीं। 2005 में पूरे बिहार में लगभग 3000 शराब की दुकानें थीं, जो मात्र 2015 तक नीतीश कुमार के 10 वर्षों के शासनकाल में बढ़कर 6000 से अधिक हो गईं। इनमें से अधिकांश दुकानें नीतीश कुमार ने ग्रामीण क्षेत्रों और पंचायतों में खुलवाईं, ताकि हर घर तक शराब आसानी से पहुंचाई जा सके। आजादी के बाद 1947 से 2005 तक, यानी 58 वर्षों में बिहार में केवल 3000 दुकानें खोली गईं। लेकिन नीतीश कुमार ने अपने 10 वर्षों में ही इसे दोगुना यानी 6000 कर दिया। इसका मतलब है कि 58 वर्षों में औसतन प्रति वर्ष केवल 51 दुकानें खुलीं, जबकि 2005-2015 के 10 वर्षों में प्रति वर्ष औसतन 300 शराब की दुकानें खोली गईं। आज जब वे शराबबंदी के नाम पर सुधारक बनने का स्वांग रच रहे हैं, तो यह विरोधाभास साफ दिखाई देता है। यथार्थ यह है कि शराबबंदी के नाम पर उन्होंने संस्थागत भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है और अफसरशाही को बेलगाम, भ्रष्ट और तानाशाह बना दिया है।

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